Maveli (महाबली) belongs to Meghvansh

I wrote a post On Megh Bhagat. It was captioned ‘Our hero’. It had some significance but I did not have any idea of its extension. Now I have a fair idea.
I was a child when my mother told me the story of King Maveli (Mahabali). It sounded in my ears like this: the king was so good then why someone grabbed his kingdom by fraud. Well the story was over. I fell asleep.
I got a chance to serve my organization in Trivandrum. I saw first time the fervor with which Onam is celebrated in Kerala. With much emotion and good expense people celebrate the festival. Some people (no idea who these people are) sell their belongings to celebrate the festival with determination to keep the glitter maintained. A year later I was transferred from there. But Onam festival of Kerala kept haunting my mind.
I happened to visit Jammu for attending celebrations of Kabir Jayanti. A delegation of Meghwals of Rajasthan had come. They brought along some literature. There were two important things. One was the manifesto of Balijan Cultural Movement and other a book by Shri R.P. Singh’s- ‘Meghvansh – Ek Singhavokan (An overview)’. I casually read both and partially published them on MEGHnet. Unknowingly a sentence kept on coming to my dim memory. It was a prayer of Meghvanshi Balai people (belonging to Madhya Pradesh, Rajasthan and Chhattisgarh). They pray like this- ‘Ala jaye bala jaye – Bali ka raj aye’ i.e. ‘let all nonsense go and let the regime of King Bali come back.’
Then I got an idea to use quotes from ‘Meghvansh- Ek Singavlokan’. As I prepared for the use of materials a very serious situation arose in front of me. Megh, Meghwal, Meghwar, Maheshwari Meghwar, Megh Rishi, Vritra and his generations, Rishi Kashyap, Diti, Aditi, Sur, Asura, Hiranyaksyap, Hirnaksha, Ban, Mahabali (popularly known as Maveli in Kerala), Prahlada, Many warriors of Mahabharata, Nag, Nagvansh, Buddhism, Dragon, Jainism, Cārvāka (Charvak), Kalinga, Khaarvel, Mahameghvahan etc. The available information looked like a black canvass having no other color or light.
It took two months to understand what was visible was an artificially created black sky. The depiction of demons (Asuras) in religious books and comics was in fact someone’s defeated past, which was featured as dirty and ugly as possible. Where ever it was made presentable it was through the image of devotee (Bhakta) Prahlad. It was methodology of endorsing slavery by narrating it as ‘good’ and ‘ok’.
Prahlad was the son of King Bali. His predecessors and successors were struggling for their due but invaders were overpowering them. The shine of King Bali’s image has survived through centuries. His subjects and successors in Kerala kept his memories alive and they did not forget him. His work and qualities are remembered on the festival day of ‘Onam’.
Onam like festival relating to King Bali is not celebrated in any other corner of India. But it was surprising to know that Maveli is remembered by a community in Madhya Pradesh, Rajasthan and Chhattisgarh. Balai community there still prays for return of regime of King Bali. In mom’s story I hear a prayer for return of King Bali.
I know that the time has changed a lot. Mahabali’s generations after going through centuries of abject poverty and torture have now begun to see the light of progress. This is not the era for making ethnic differences worse. It is time to evolve the society and not revolve it. However, if no good picture of the past is available then it is better to save Maveli’s shining picture to feel good. If I am not too emotional, can’t we celebrate Onam our own way?
मावेली (महाबली) मेघवंश के हैं 

मेघ भगत और मेघ नेट पर मैंने हमारे हीरो के नाम से एक छोटी सी पोस्ट मैंने डाली थी. उसका कुछ महत्व था लेकिन उसके विस्तार का अनुमान नहीं था. अब है.बचपन में माँ ने मुझे राजा बली (महाबली) की कहानी सुनाई थी. मेरे कानों में वह यों लग रही थी कि राजा इतना अच्छा था तो किसी ने धोखे से उसका राज्य क्यों हड़प लिया. ख़ैर कहानी समाप्त हो गई. मैं सो गया.
नौकरी के दौरान तिरुवनंतपुरम में रहने का अवकर मिला. पहली बार पता चला कि केरलमें ओणम का त्यौहार मनाया जाता है. बहुत भावुकता के साथ और ख़ूब व्यय करके लोग यह त्योहार मनाते हैं. कुछ लोग (पता नहीं ये कौन लोग हैं) अपना घर-बार बेच कर भी इस त्योहार की चमक-दमक बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प होते हैं. एक वर्ष के बाद मेरा वहाँ से तबादला हो गया. परंतु केरल मेरे मन में कहीं टँगा रहा. 
कबीर जयंती के एक समारोह में मुझे जम्मू जाने का मौका मिला. वहाँ राजस्थान के मेघवालों का एक प्रतिनिधि मंडल आया हुआ था. वे अपने साथ कुछ साहित्य भी लाए थे. उसमें दो महत्वपूर्ण चीज़ें थीं. एक तो बलीजन आंदोलन का घोषणापत्र(मेनिफ़ेस्टो) और दूसरे श्री आर.पी. सिंह की पुस्तक मेघवंश- एक सिंहावलोकन’. मैंने दोनों सरसरी तौर पर पढ़े और मेघनेट पर अंशों में प्रकाशित किए. एक पढ़ी हुई बात कहीं मन पर पड़ी रह गई कि राजस्थान में बलाई समाज के लोग, जो मेघवंशी हैं,  प्रार्थना करते हैं कि अला-बला जाए, बली का राज आए’.
इसके बाद विचार आया कि मेघवंश एक सिंहावलोकन को विस्तार से देखा जाए और इस पुस्तक के उद्धरणों का प्रयोग किया जाए. जैसे ही मैंने यह सामग्री के प्रयोग की तैयारी की और कई आलेखों के आंतरिक जोड़ देखे तो बड़ी गंभीर स्थिति सामने आने लगी. मेघ, मेघवाल, मेघवार, माहेश्वरी मेघवार, मेघ ऋषिवृत्र और उसकी संतानें, ऋषि कश्यप, दिति, अदिति, सुर, असुर, हिरण्यकश्यप, हिरणाक्ष, बाण, महाबली (केरल में मावेलीनाम से प्रसिद्ध), प्रह्लाद, महाभारत के अनेकों योद्धा, नाग, नागवंश, बौद्धधर्म, ड्रैगन, जैनधर्म, चार्वाक, कलिंग, खारवेल, महामेघवाहन आदि की जानकारी एक काला कैन्वास बन कर खड़ी हो गई जैसे उसमें कोई अन्य रंग या प्रकाश हो ही नहीं. 
यह समझने में दो महीने लग गए कि जो दिखाई दे रहा था वह नकली आसमान था जो काला दिख रहा था. धार्मिक पुस्तकों, पाठ्यक्रम, कॉमिक्स आदि में जिसे असुर या खलनायक के रूप में देखता रहा था वह वास्तव में किसी का पराजित अतीत था जिसे यथासंभव गंदे और भद्दे रूप में चित्रित किया गया था. यदि उसे अच्छा बना कर पेश किया भी गया तो भक्त प्रह्लाद बना कर. यह भी दासत्व पर मुहर लगाने का एक तरीका था कि यह ठीक था और अच्छा था. 
राजा बली प्रह्लाद की संतानों में से है. उनके पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती वंशज आक्रमणकारियों से जूझते रहे और दबाए जाते रहे. केवल राजा बली की तस्वीर है जिसकी चमक मिटाए से मिटी नहीं. केरल में उसके वंशजों और प्रजाओं ने उसे भूलने नहीं दिया और उसके गुणों को एक पर्व ओणमके रूप में याद करते रहे. 
राजा बली से जुड़ा ओणम जैसा पर्व भारत के किसी और कोने में दिखाई नहीं देता. लेकिन यह जान कर आश्चर्य हुआ कि महाबली या मावेली को स्मरण करने वाला एक समुदाय मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी है. वहाँ के बलाई आज भी प्रार्थना करते हैं कि राजा बली का राज आए. मुझे माँ की सुनाई कहानी में भी कहीं सुनाई पड़ता है कि राजा बली का राज आए. 
मैं जानता हूँ कि अब समय बहुत बदल गया है. महाबली की संतानें शताब्दियों तक घोर यात्नाएँ और घोर ग़रीबी झेलने के बाद अब प्रगति का उजाला देखने लगी हैं. जातिगत मनमुटावों को हवा देने का युग नहीं है. यह समय समाज को आंदोलित करने का नहीं बल्कि उसे विकसित करने का है. तथापि अगर अतीत की कोई साफ़ सी तस्वीर उपलब्ध हो तो उसे सहेज कर रखना अच्छा लगता है. अगर मैं बहुत भावुक नहीं हो रहा तो क्या हम अपने यहाँ ओणम नहीं मना सकते?
अब आप ओणम के बारे में एक सार लेख पढ़ सकते हैं:-
ओणम
ओणम केरल के लोक-जीवन को हर्षोल्लास से भर देने वाला मुख्य त्योहार है. यह राज्यभर में मनाया जाता है. ओणम में केरल की पुरानी महिमा, गरिमा, वैभव और सुख-समृद्धि की झलक देखने को मिलती है. मानसून में जब भूमि हरियाली से पट जाती है, उसी समय केरल में ओणम का त्यौहार मनाया जाता है. यह केरल में नया साल शुरू होने का त्योहार भी है. 
अत्तप्पूव ओणम का एक अभिन्न अंग है. रंग-बिरंगे फूलों से चित्र रचना (अल्पना) करके पूजा करती हैं. हर दिन सुबह पुराने पुष्प हटाये जाते हैं, नए सजाए जाते हैं. ओणम की धूम-धाम छह दिन तक चलती है. छह दिनों में परिवारों में बड़ा भोज होता है. परिवार के सारे सदस्य, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हों, तिरुओणम (श्रीओणम) के दिन माता-पिता के साथ भोजन करने अपने घर में आ जाते हैं. तिरुओणम के दिन सुबह परिवार में सब को नये-नये कपड़े बांटे जाते हैं, जिसे ओणप्पुडवा कहते हैं यानी कपड़ा. ओणम के दिनों में हर घर में बच्चों के लिए झूले लगाये जाते हैं. स्त्रियाँ लोकगीत गाकर नृत्य करती हैं. इस त्यौहार के अवसर पर कबड्डी और गेंद (देशी) का खेल भी होता है. नौकोत्सव भी ओणम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. 
इतिहास के अनुसार केरल के मशहूर पेरूमाल वंशी राजा चेरमान पेरूमाल ने इस महोत्सव का श्रीगणेश किया था. वे महाबली को एक आदर्श पुरुष मानते थे. तृक्काक्करा मंदिर में चूंकि वामन की मूर्ति प्रतिष्ठित है, अत: श्री पेरुमाल ने वहाँ प्रतिवर्ष ओणम, महोत्सव के रूप में मनाये जाने के कुछ तौर-तरीके नियत किये. कर्क महीने के श्रवण नक्षत्र से शुरू होकर सिंह महीने के श्रवण नक्षत्र तक, जिस दिन महाबली को वामन से मुक्ति मिली, केरल के कोने-कोने में यह त्योहार धूम-धाम से मनाए जाने का निश्चय किया था. उन दिनों अट्ठाइस दिनों तक महोत्सव मनाया जाता था. 
पौराणिक कथा के अनुसार असुर वंश के राजा महाबली केरल में शासन करते थे. उनके शासनकाल में न कहीं असमानताएँ थी न ही धोखा-धड़ी, सर्वत्र न्याय और धर्म का शासन था. उनकी न्यायप्रियता ओर धर्मनिष्ठा से इंद्रासन हिलने लगा. इंद्र ने महाविष्णु से इस स्थिति से बचाने की प्रार्थना की. महाविष्णु वामन का रूप धारण कर महाबली के पास आये और तपस्या के लिए तीन पग भूमि मांगी. बली ने बड़ी प्रसन्नता से ब्राह्मण को भूमि देने का वचन दिया, लेकिन वह जन हितैषी राजा ठगे गये. सहसा वामन ने बृहद रूप धारण करके बली की वचनबद्धता का फायदा उठाते हुए दो ही पगों से स्वर्ग, पाताल और भूमि नाप ली. बली ने तीसरे पग नापने के लिए अपना सिर झुका दिया. वामन ने बली के सिर पर तीसरा पग नापते हुए उन्हें पाताल में धंसा दिया. यही कहा जाता है कि पाताल जाने से पहले बली ने वामन से हर साल एक बार अपनी प्रजा की कुशल क्षेम जानने के लिए अपने राज्य में आने की अनुमति माँगी थी और वामन ने अनुमति दी भी थी. केरल के लोगों को विश्वास है कि हर साल सिंह महीने के शुक्ल पक्ष द्वादशी को महाराज बली अपनी प्रजा का कुशल-क्षेम जानने के लिए पधारा करते हैं. 
ओणम के दिन जनता अच्छी मिठाइयाँ पकाकर, नए कपड़े पहनकर घरों और रास्तों में दीप जलाकर राजा बली का भव्य स्वागत तथा पूजा करने की परिकल्पना करती है. लोगों को विश्वास है कि उत्तराषाढ़ की रात को राजा महाबली हर घर का दौरा करते हैं और इसलिए इस दिन रात-भर में अखंड दीप जलाये रखते हैं. इस प्रकार लोग अपने प्रजाहितैषी भूतपूर्व सम्राट को यह बताते हैं कि हम आज भी आपके शासनकाल के समान सुखी और सकुशल हैं. 
बाजार में करोड़ों का कारोबार होता है. सरकार की ओर से सभी जिला केंद्रों और राजधानी तिरुवनंतपुरम में कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. लोक कलाओं की प्रस्तुति और मनोरंजक कार्यक्रम भी होते. ओणम को वर्ष 1961 में राजकीय त्योहार घोषित कर दिया गया. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त होने के कारण ही भारत सरकार ने ओणम पर्व को पर्यटन सप्ताह घोषित किया. इस दौरान हजारों सैलानी पर्यटन के लिये केरल आते है.

यू-ट्यूब पर ओणम और राजा बली


Onam and Raja Bali on You Tube


(ऊपर दिए गए चित्र विकिपीडिया से लिए गए हैं)

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7 Responses to Maveli (महाबली) belongs to Meghvansh

  1. बहुत ही सुन्दर आलेख. हमने कहीं पढ़ा था की महाबली का मूलस्थान कुरुक्षेत्र में कहीं था. इसी का बिगडैल बेटा बाणासुर था जिसकी राजधानी तेजपुर, असम में कही गयी है.

  2. Bhushan says:

    टिप्पणी के धन्यवाद. मैं भी खोजी हूँ. जो मिलेगा इसी ब्लॉग पर रख दूँगा

  3. Bhushan says:

    ऊपर जिन श्री पी.एन. सूब्रमणियन ने टिप्पणी की है वे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् हैं. इन्होंने कई कई खोजपूर्ण लेख लिखे हैं.

  4. Rattan says:

    It confirms that the Ancient Aryans led by their war hero Indira did have a long-drawn tiff with the Pre-Aryans who predominently beloged to the Megh-Vansh, as is also evident from Indira's war against Vritra, mentioned as the 'Pratham- Megh.'

  5. Mohan Devraj says:

    I am delighted to read the article Maveli or Mahabali and the subsequent article about the festival Onam. Perhaps one can agree with the historical point that one ancient tradition is often told by the people of different regions of India into the different versions. For instance, the epics Ramayana and Mahabharata and their several versions. In case of Raja Bali, I found a tradition in the Meghwar origin story (Book Megh Mahayatamaya in Gujarati authored by Nathguru Jivannathji)where Raja Bali has been shown interacting with Rishi Shringya and Megh Dharu.
    To my own opinion Vamansthali or the present Vanthali (a modern town in Gujarat state) should have been the royal seat of Raja Bali, where the Incarnation Waman is said to have pressed down the king into the earth, later the place came to be known after the name of Waman Dev. However the further research in this regard is yet to be done. The tradition of Raja Bali might have been received in the certain period of time by the South Indian region with more exhilaration.

  6. Bhushan says:

    Thanks Dear Mohan Ji, your comment draws attention and is welcome. This is one of the areas to be researched for reconstruction of our ancient history. I hope many people join these efforts in near future. Thanks again and we await your thesis.

  7. Rahul says:

    Thank you Bharat Bhushan Sir for raising historical topic relating to Meghwal identity. As far as western Gujarat (Kachchh)(erstwhile Sindh-Kachchh region) is concerned, we Maheshwari Meghwars have an interesting tradition to confirm much awaited return of Raja Bali's rule. People from our community are following an unique tradition during Diwali i.e. on Kali Chaudas Day – Kids/youths will take a 3 feet sugarcane stick with cotton tied on it and after burning the same, they will go each and every fellow community brother's home and will say “HORI, DIYARI, MEGH RAJA JE GHARE MERIYO BARE”, which means – lights shall ignite in the house of Megh Raja on every Holi and Diwali”. In return, the householder will pour one spoon Ghee on the burning cotton. Eventually, after roaming almost all homes, all these Sugarcane stick (MERIYO) are kept at the outskirts. These MERIYAS when seen together gives a marvelous glimpse of unity of Meghwar community.

    The basic idea behind all these traditions is to kept alive our crave for retaining our lost pride that we (Meghwars/Meghwals) are descendants of Great Ruler of ancient India. In our forefathers rule, we were happy and living a dignified life. As such, this tradition of remembering Bali Raja/Megh Raja is to keep alive our ambitions of restoring our lost rule and pride. I think so.

    Thanks again for your cause of uniting entire Meghwals of India under one platform.

    Navin K. Bhoiya
    Kachchh-Gujarat

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