जाने वाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है

वर्ष 1951 में फिरोज़पुर में मैं पैदा हुआ था. 1953 से 1959 तक मेरा बचपन अमृतसर मे गुज़रा जहाँ की गलियाँ, रास्ते, दिलीप सिंह ताँगेवाला, बचपन का दोस्त जज सिंह सब याद आते हैं और याद आती है बचपन की सहेली गोली (घर का नाम) जो रंगबिरंगे काग़ज़ों से भरा एक टोकरा उठा कर अपना रिश्ता स्वयं ले कर कभी भी हमारे घर आ जाया करती थी और मेरी माँ को कहा करती थी कि मुझे भूषण से शादी करनी है. नौकरी के सिलसिले में पिता जी को अमृतसर छोड़ना पड़ा. 1961 में मैं एक बार अमृतसर लौटा. उनके घर गया तो घर के बरतन कर रही थी. उसके भाई ने हँसते हुए उसे मज़ाक में पूछा,भूषण से शादी करेगी?” शर्म और सताए जाने के भाव से उसके मुँह से आं….ही निकला. स्थानांतरण के कारण मैं उसके बाद कभी अमृतसर नहीं गया. चार-पाँच वर्ष बाद एक महिला ने बताया था, “गोली ते मर वी गई.”

चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
तेरी कुड़माई (सगाई) हो गई?

बड़े होकर चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी पढ़ी थी- उसने कहा था. उसमें अमृतसर की गलियों का वर्णन देख कर मैं रुआँसा हो गया था. कहानी का अंत भी दुखांत था. मुझे गोली की याद आई.
मैं उक्त फिल्म का गीत आपसे शेयर करना चाहता हूँ जो जंग पर जाने वाले जवानों,उनके सामाजिक संबंधों और युद्ध की विभीषिका पर फिल्माया गया है. मक़दूम के गीत को विकल कर देने वाला संगीत सलिल चौधरी ने दिया. यह क्लासिक है. भावुक कर देता है. आप भी सुने-
 
कहानी का लिंक- उसने कहा था

27 comments:

प्रवीण पाण्डेय said…

उसने कहा था, बहुत पहले पढ़ी थी, पुनः याद हो आयी।

mahendra verma said…

जीवन की कुछ घटनाएं मन में स्थायी रूप से अंकित हो जाती हैं, कभी मिटती नहीं। आपके जीवन का यह प्रसंग बहुत मार्मिक है। मन्ना डे का गाया हुआ गीत सुनकर मन भावुक हो गया। इस अनूठी प्रस्तुति के लिए आपका आभार।

दिगम्बर नासवा said…

जीवन की बहुत सी बातें दिल के केनवास पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं …. जो कभी नहीं जाती …. मन्ना दा… का ये गीत सुनके बहुत अच्छा लगा … लाजवाब गीत .. .

Anjana (Gudia) said…

मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था के ‘यूँ होता तो क्या होता’, ये ख़याल हमारे दिलों में भी अक्सर आता है… नहीं जानती की गोली की याद कभी ये सवाल आपके ज़ेहन में उठाती है या नहीं… मगर ये भी सच है के ‘होता वही है जो मंज़ूर-ऐ-खुदा होता है’… तो दिल को दुखा के भी कोई फायदा नहीं… लेख और उसके साथ विडियो दोनों ही बहुत अच्छे लगे… ‘उसने कहा था’ का लिंक देने के लिये भी शुक्रिया.

Bhushan said…

@ प्रवीण पांडे, जी धन्यवाद @ महेंद्र जी, कई चीज़ें मिल कर याद आती हैं. पिछले दिनों से यह गीत याद आ रहा था और यूट्यूब पर मिल भी गया और यादें भी ले आया. @ दिगंबर नासवा जी, वाकई यह गीत बहुत अच्छा है. @ गुड़िया, तब मैं बहुत छोटा था. वास्तव में गीत के बहाने कुछ स्मृति हो आई जिसे लिख दिया. लिख देने से अच्छा भी लग रहा है.

प्रमोदपाल सिंह मेघवाल said…

आपने बेबाकी से अपने बचपन की यादें उजागर कर दी। यह प्रसंग बहुत मार्मिक है।

कविता रावत said…

bahut achhi prastuti.. aabhar

Bhushan said…

@ प्रमोद जी, @ कविता रावत जी, आप दोनों का आभार.

Apanatva said…

mai pahile se behtar hoo poorn swasth nahee…..march tak blog se viyog hee rahega………. poora dhyan rakha ja rahaa hai chinta kee koi baat nahee…….

Apanatva said…

aur haa ise apanatva ke liye bahut bahut aabhar……….. mujhe ye batorna batna douno hee bahut pasand hai……..

Amit Shandilya said…

Really a classic song. Overall, the posts makes me sad. Our best songs are sad only. This post is a simple sad song.

DBZ said…

अंकल जी आपके जमाने में भी ऐसा होता था :))

Bhushan said…

हाँ प्यारे, यह तो युग-युग से होता आया है जब से दुनिया बनी है.

Pallavi said…

सर, दिल छूलेने वाली रचना है यह आप कि, या फिर यह कहना ज़यादा ठीक होगा कि दिल छूलेने वाला लेख है ये आप का मुझे बहुत अच्छा लगा लिखते रहिये आखिर बचपन-बचपन ही होता है चाहे किसी का भी क्यूँ ना हो हर एक बचपन से जुडी उसकी कुछ मिट्ठी यादें होती है और आप ने अपने बचपन कि यद्दों को हमारे साथ बांटना पसंद किया यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी ….

Bhushan said…

@ सरिता जी, @ अमित जी, @ पल्लवी जी, आप सभी का आने के लिए आभार. कुछ यादों को बाँट लेना अच्छा रहता है. आपके दयालु शब्दों के लिए धन्यवाद.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said…

आदरणीय भूषण जी प्रणाम ! जाने वाले सिपाही से पूछो वो कहां जा रहा है इस पोस्ट के लिए आपकी जितनी प्रशंसा करूं , कम है … तेरी कुड़माई हो गई?गुलेरीजी की कहानी ‘उसने कहा था ‘ का यह वाक्य अगर किसी की स्मृति से धूमिल हो गया तो वह साहित्य का विद्यार्थी ही नहीं ! “भूषण से शादी करेगी?” शर्म और सताए जाने के भाव से उसके मुँह से ‘आं….’ ही निकला. चार-पाँच वर्ष बाद उसकी मृत्यु की खबर आई. … पढ़ने के बाद निश्छल निष्पाप प्रेम का ख़ज़ाना आप पर लुटा देने वाली उस स्मृतिशेष पुण्यात्मा के प्रति मन श्रद्धा और उदासी से भर गया … … … ! गीत मेरे स्वर्गीय बाबूजी के युग का है … कई बार सुना हुआ है। पुनः सुना इसका एहसास भी बीते हुए बचपन की स्मृतियों में ले गया ; मन भर आया … आपने इन दुखों में छुपा कर जो सुख दिया उसके लिए आभार ! … और हां, तीन दिन पहले ही आ चुका था, शायद पहला कमेंट मेरा ही होता … लेकिन उस दिन चुपचाप लौट गया था … … … ~*~हार्दिक शुभकामनाएं और मंगलकामनाएं !~*~ – राजेन्द्र स्वर्णकार

Bhushan said…

@ प्रिय राजेंद्र जी, आपका कमेंट कई मायनों में पहला ही है. आपका आभार.

Patali-The-Village said…

इस अनूठी प्रस्तुति के लिए आपका आभार।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said…

बड़ा ही मार्मिक फिल्मांकन है ! पुरानी यादें अक्सर आँसुओं का साथ देती हैं !

सुरेन्द्र सिंह ” झंझट “ said…

bahut hi sarahniy post. hardik aabhar.

ZEAL said…

पुरानी यादें भावुक कर देती हैं..

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said…

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें….. ——— हिन्‍दी के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले ब्‍लॉग।

Coral said…

आप को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं!

Minakshi Pant said…

“उसने कहा था ” बहुत पहले पड़ी थी आज फिर याद ताजा हो गई ! गाना सुनकर बहुत अच्छा लगा ! आपका बहुत धन्यवाद ! गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई !

: केवल राम : said…

याद आ गया सब कुछ …क्या तेरी कुडमाई हो गयी है …..वाह

Bhushan said…

@ पताली जी @ मर्मज्ञ जी @ सुरेंद्र जी @ दिव्या जी आप सभी का आभार

Bhushan said…

@ ज़ाकिर जी @ डॉ तृप्ति जी @ मीनाक्षी जी @ केवल राम जी आप सभी का आने और टिप्पणी देने के लिए आभार.
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Born on January, 13, 1951. I love my community and country.
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