Odisha – An immune state – ओडिशा- जहाँ ग़रीबों की हाय नहीं लगती

अब बोलना सीख रहा है उड़ीसा.
1984 में हैदराबाद में मेरे एक सहकर्मी ने हँसते हुए बताया था कि उड़ीसा के जंगलों में रहने वाले लोग कपड़े ही नहीं पहनते. उसका चटखारा कुछ और कह रहा था. मेरी अल्प बुद्धि इतना ही जानती थी कि ग़रीब समुदायों के पास पहनने के लिए वस्त्र हों तो अवश्य पहनते हैं. मैंने उस सज्जन को प्रेम से फटकार लगाई थी.
वर्ष 2010 के अंत में हमारे कुछ सहकर्मी भुवनेश्वर में एक कार्यक्रम में भाग ले कर लौटे. मैंने पूछा, भुवनेश्वर कैसा लगा?” बहुत उदास स्वर में उत्तर मिला, सर, बहुत ग़रीबी है वहाँ. मंदिरों के बाहर खड़े लोगों को देखा नहीं जाता. पहनने को कपड़े तक नहीं हैं. मन में कई बातें कौंध गईं.
हाथ उठाने की नौबत क्यों आए?

म्यूचुअल फंडों में निवेश के मामले में ओडिशा प्रथम है. कालाहाँडी का स्थानीय उत्पाद केवल बाँस है. रसूख वाले लूट कर ले जाते हैं. उसके बदले में स्थानीय लोगों को कुछ नहीं मिलता. लोग भूख से मरते हैं.

एक समाचार-पत्र में पढ़ा था कि ओडिशा के ग़रीब मज़दूर आंध्रप्रदेश में खेतों में काम करते हैं. ज़मींदार उन्हें 50-60 रुपए दिहाड़ी देते हैं. यदि वे मज़दूर पत्नी को भी साथ लाते हैं तो 70-80 रुपए मिल जाते हैं. इस बारे में बात करने पर ओडिशा के एक युवा एक्ज़िक्यूटिव ने कहा कि वे लोग प्रगति करना ही नहीं चाहते. (ग़रीब लोग प्रगति करना नही चाहते?) मैंने प्रतिक्रिया में भौहें उठा कर उसे देखा. अपने बेशर्म उत्तर पर उसकी पलकें एक बार भी नहीं झुकीं जो उसकी आंतरिक दरिद्रता का संकेत था.
कुछ वर्ष पूर्व ओडिशा में आए महाचक्रवाती तूफान के बाद सहायता कार्यों में लगी एजेंसियों के लोग हैरान-परेशान थे कि पूरी दुनिया से मदद आ रही थी लेकिन प्रभावित लोगों तक नहीं पहुँच रही थी. निर्धन बिलखते रह गए. सहायता समाप्त हो गई.

भारत में ओडिशा सब से ग़रीब राज्य
बिहार की ग़रीबी और वहाँ की राजनीति पर खूब हँसी-ठठ्ठा हुआ है. ओडिशा की अति ग़रीबी और भ्रष्ट राजनीति पर ऐसा नहीं हुआ. इसका कारण मैं समझता हूँ कि ओडिशा के ग़रीब को बोलने लायक नहीं छोड़ा गया. उसकी हाय न तो जगन्नाथ तक पहुँची, न ही ज़िम्मेदार भ्रष्ट लोगों पर पड़ी.

ग़रीबों के हक में यह मुँह इससे आधा भी खुले तो ईश्वर को खुशी होगी

20 comments:

निर्मला कपिला said…

मार्मिक स्थिती। यहीं तो मेरा भारत महान है।

Rajesh Kumar ‘Nachiketa’ said…

अरे मैं तो कहता हूँ कहीं के गरीब की हाय नहीं लगती अब. अगर लगती होती तो अब गरीब नहीं होते बल्कि उन को गरीब बनाने वाले हाय हाय कर रहे होते.

mahendra verma said…

‘‘उसकी हाय न तो जगन्नाथ तक पहुँची, न ही ज़िम्मेदार भ्रष्ट लोगों पर पड़ी‘‘ आपका उपर्युक्त कथन मार्मिक है। सच है, ग़रीबों की सुनने वाला कोई नहीं है। स्वयंसेवी संस्थाओं को इस दिशा में कुछ करना चाहिए।

प्रवीण पाण्डेय said…

उड़ीसा के लोग बड़े सीधे हैं, नहीं जानते कि क्या पहुँचना चाह रहा है उन तक।

Bhushan said…

@ निर्मला जी, गूगल छवियाँ ओडिशा की बहुत खराब तस्वीर देती हैं. बहुत ही मार्मिक. उन्हें मैंने छोड़ दिया. @ राजेश जी, आपके कथन की गहराई मापना कठिन है. आप ठीक कह रहे हैं. @ महेंद्र जी, कुछ स्वयं सेवी संस्थाएँ हैं परंतु उनकी सीमाएँ हैं. यही कमज़ोर पक्ष भी है. @ प्रवीण जी, मेरा विचार है कि उड़ीसा के लोग सीधे हैं और अशिक्षित हैं. उनके साथ क्या हो रहा है वे नहीं जानते. शायद अब समझने लगे हैं. पहुँचने को तो उन तक नक्सलवादी भी पहुँचे परंतु हथियार देने. रास्ता तो शिक्षण और प्रशिक्षण का होना चाहिए.

Indranil Bhattacharjee ………”सैल” said…

भूषण जी, मैं खुद उड़ीसा से हूँ और वहाँ के समाज को करीब से देखा है … दुनिया में जहाँ भी लोग धार्मिक रुढिवादिता में बंधकर रह जाते हैं वहाँ उन्नती भी रुक जाति है … उड़ीसा की गरीबी का कोई एक कारण नहीं है, पर सबसे बड़ा कारण भी यह है कि यहाँ आज भी परोक्ष रूप से ज़मींदारी प्रथा चालु है …

Bhushan said…

@ इंद्रनील जी, आपने सही कहा. ज़मींदारी प्रथा है तो ग़रीबी तो रहेगी ही. इससे तो सरकार ने ही निपटना है. इच्छा शक्ति कहाँ है?

Anjana (Gudia) said…

‘उसकी हाय न तो जगन्नाथ तक पहुँची, न ही ज़िम्मेदार भ्रष्ट लोगों पर पड़ी.’ सच है, सर. ना जाने कब तक यूँ ही चलता रहेगा? मगर जब तक यूँ ही चलता रहेगा तब तक नक्सलवादी यूँ ही आसानी से गरीबों के खाली हाथों में हथियार थामते रहेंगे और हम सब मुंह ताकते रहेंगे…. अच्छी पोस्ट के लिये शुक्रिया

Bhushan said…

@ आपने तो ओडिशा में सहायता कार्य को चलते देखा है अंजना जी. उनकी पीड़ा को कम करने में सहायक भी रही हैं. आपकी एक पोस्ट का मैंने ऊपर उपयोग किया है. आपकी वह पोस्ट दुआओं से भरी है. आभार.

Anjana (Gudia) said…

Thank you, sir!

shiva said…

‘उसकी हाय न तो जगन्नाथ तक पहुँची, न ही ज़िम्मेदार भ्रष्ट लोगों पर पड़ी.’ सच है, बहुत ख़ूब ! shiva12877.blogspot.com

: केवल राम : said…

उसकी हाय न तो जगन्नाथ तक पहुँची, न ही ज़िम्मेदार भ्रष्ट लोगों पर पड़ी‘‘ आदरणीय भूषण जी इस कथन में आपने सिर्फ ओडिशा के व्यक्तियों की ही नहीं बल्कि हर उस व्यक्ति कि संवेदना को अभिव्यक्त किया जो इन परिस्थितियों से झुझता है …आपका आभार

Harman said…

nice post.. Please visit my blog. Lyrics Mantra Download Free Music

Patali-The-Village said…

मार्मिक स्थिती। सच है, ग़रीबों की सुनने वाला कोई नहीं है|

दिगम्बर नासवा said…

मार्मिक … KOUN INKI SUNEGA …

सुरेन्द्र सिंह ” झंझट “ said…

hridayshparsi, marmik post. gareebon ki kaun sunega….shayad BHAGVAN.

Minakshi Pant said…

बहुत ही मार्मिक व्यथा अब तो गरीब लोग भी इसके आदि हो गये हैं क्युकी वो भी जानते हैं कि हमारी आवाज़ कोंन सुनेगा वो भी अपनी जिन्दगी उसी हाल मै गुजार देते हैं कि शायद किस्मत मै यही लिखा था ! गरीबों कि व्यथा को दर्शाती हुई खुबसूरत प्रस्तुति ! काश हमारी कलम ही उनके लिए कुच्छ कर पाती ?

राजीव थेपड़ा said…

aapki is post ne viakal kar diyaa…..

Bhushan said…

@ शिवा जी @ केवल राम जी @ हरमन जी @ Patali-the-village @ दिगंबर नासवा जी आप सभी को पधारने के लिए और टिप्पणियों के लिए आभार.

Bhushan said…

@ सुरेंद्र सिंह जी @ मीनाक्षी पंत @ राजीव थेपड़ा जी आपकी टिप्पणियों और भावनाओँ के लिए आभार.
Advertisements

About meghnet

Born on January, 13, 1951. I love my community and country.
This entry was posted in रचनात्मक. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s