Gandhi and voice of conscience – गाँधी और आत्मा की आवाज़

Matter is serious. Gandhi’s soul approves help to Pakistan. Godse’s soul disapproves it. His sound of soul asks him to kill Gandhi. He kills Gandhi. What the hell is this sound of soul?

It is said that the element of soul is same in everybody. Why its sound is different in different people? Person’s inner voice is nothing but his own deep thinking. These thoughts are merely impressions and suggestions imprinted on our brain or mind. Some intense thoughts become Divine Message, God’s message, etc. Voice of the soul is the product of one’s own impressions and suggestions. Divine Message is a complicated function of our own mind.
There is no divine message without brain, mind and or body.

एक गंभीर बात मन पर उतर आई कि गाँधी की आत्मा ने कहा कि पाकिस्तान को मदद दे दो और गोडसे की आत्मा ने कहा कि ऐसा सोचने वाले गाँधी को ही मार डालो और उसने कर दिया. यह आत्मा क्या चीज़ है?

हालाँकि सब में एक ही आत्मा होने की बात कही जाती है लेकिन उसकी आवाज़ अलग-अलग क्यों है? वास्तव में व्यक्ति के भीतर की आवाज़ को दिल, दिमाग, आत्मा आदि की आवाज़ के विभिन्न नाम दिए गए हैं. मूलतः यह व्यक्ति की सोच होती है जो उसके मन पर पड़ते संस्कारों (impressions and suggestions) की निरंतता के कारण घनी हो जाती है. इसे कोई ‘Divine Message’, ‘ईश्वरीय वाणी ‘देववाणी’ इल्हामआदि भी कह देता है. आत्मा की आवाज़ अपने ही विचारों-संस्कारों का उत्पाद है. ‘आकाशवाणी’ होती सुनाई दे तो वह अपने ही मन की जटिल कार्यप्रणाली के कारण होता है.
अपने मन-मस्तिष्क या शरीर से बाहर कोई ‘आकाशवाणी’ या आत्मा की आवाज़ नहीं होती.
 
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15 Responses to Gandhi and voice of conscience – गाँधी और आत्मा की आवाज़

  1. अभी आत्मा की आवाज पर तो नहीं कहूंगा लेकिन गाँधी पर जरूर कुछ कहना चाहूंगा। बेचारे गाँधी जी को न दलितों ने माना, न हिन्दुओं ने और न मुसलमानों ने। फिर भी गाँधी बने हुए हैं और बने रहेंगे।

  2. सदा says:

    विचारात्‍मक प्रस्‍तुति ।

  3. हमारी इन्द्रियों से सूक्ष्म है हमारा मन और मन से ऊपर है बुद्धि तथा बुद्धि से भी ऊपर तथा सूक्ष्म आत्मा है।आत्मा की मनाही के बावजूद हम गलत कार्य करते चले जाते हैं, जिससे हमारा मन अशांत और अधीर होता चला जाता है। यदि हमें अपने मन को शांति प्रदान करनी है, तो हमें अपनी आत्मा की आवाज सुननी होगी। इसी से सच्चे सुख, शान्ति और जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति होगी। बडे-बडे महात्मा ज्ञानी भी आत्मभाव को सुनने की सलाह देते हैं।

  4. Bhushan says:

    Pallavi Saxena has sent this comment by email:
    जैसा की श्री चन्दन कुमार जी ने कहा है। मैं भी कहना चाहूंगी कि आत्मा के विषय में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, हाँ गांधी जी और नथुराम गोडसे के बारे में जरूर इतना कहना है। कि वो भी इंसान बुरा नहीं था। यदि आपने India Today का वह अंक पढ़ा हो जो गोडसे पर ही आधारित था तो आप को जरूर पता चलेगा की वो भी बाकी के देश भक्तों के तरह ही एक देश प्रेमी था ,हाँ उसकी सोच कुछ अलग थी। मगर उसका देश प्रेम कम नहीं था। उस में लिखा था ,उसकी आस्तियां तब ही वेसर्जन की जाएँ जिस दिन सिंधु नदी तिरंगे के नीचे से बहने लगे ,जो आज तक न हो सका, और न ही आगे कभी होने कोई संभवना है ,मैं भी कई बार कई मामलों में गांधी जी को सही नहीं मानती,एक इस गोडसे के case में और दूसरा भगत सिंग के case में यदि उस वक़्त गांधी जी ने हस्ताक्षर नहीं किए होते तो भगत सिंग को फासी नहीं हुई होती। खैर यह मेरा मत है ….मगर सर आपने बहुत कम लिखा मेरी गुजारिश है आप से कि आप इस विषय पर और लिखें।

  5. Babli says:

    बहुत बढ़िया और शानदार पोस्ट! बेहतरीन प्रस्तुती!

  6. sajjan singh says:

    आत्मा की आवाज के सम्बन्ध में सब मनुष्यों की धारणा उनके अपने 'ज्ञान' और 'विश्वास' द्वारा ही निश्चित होती है । मनुष्य जिस बात को अपने विश्वास से उचित समझता है, उसी बात को आत्मा की आवाज मान लेता है । इस प्रकार आत्मा की आवाज के सम्बन्ध में मनुष्यों की धारणा उनके ज्ञान, अनुभवों और विश्वासों पर निर्भर करती है ।

  7. आप का कहना ठीक है,सब की आत्मा एक सामान होती है लेकिन सोच हर किसी की अलग अलग होती है इस लिए आत्मा की आवाज भी अलग अलग होती है|

  8. पल्लवी जी,
    आपने इंडिया टुडे का जिक्र किया है वैसी बहुत सारी बातें हैं लेकिन शायद ही भरोसे के काबिल हैं। यहाँ तो गाँधी वध को सही ठहरानेवाले लोगों की भी कमी नहीं है। लेकिन मैं या आप सब जानते हैं कि गाँधी के मर जाने से देश को क्या मिल गया? जब मैं नाथूराम गोडसे का बयान पढ़ रहा था तब मुझे गुस्सा आता था कि नाथूराम एक पागल आदमी है, बार बार धर्म की दुहाई की दी है उसने। अन्तर बस यही हो जाता है कि एक को उन्होंने कहा कहते हैं और दूसरे को उसने कहा कहते हैं।

    गाँधी वध पर कई किताबें हैं और सब बकवास किस्म की हैं। गाँधी ने भी अपने जीवन में जो सबसे बड़ी भूलें की हैं उनकी संख्या 4-5 ही है।

    लेकिन भगतसिंह की बात हमेशा लोगों को गाँधी के खिलाफ़ भड़काने वालों ने कही है। यह बात तो भगतसिंह के भाई कुलतार सिंह भी कह गए हैं लेकिन किसी को 4अक्टूबर 1930 का पिता को भगतसिंह का लिखा पत्र और 22 मार्च 1931 को साथियों को लिखा पत्र नहीं दिखता। सम्भव हुआ तो इन दोनों को अपने ब्लाग पर कभी लाऊंगा।

    और हाँ, इंडिया टुडे या किसी पर भरोसा नहीं करके शोध पर भरोसा किया जाना चाहिए। इस विषय पर जान बूझ कर कुछ लोगों द्वारा घृणा फैलाई जाती है। यह सम्भव है कि गोडसे अच्छा आदमी रहा हो लेकिन सनकी तो था ही।

    कुछ युवाओं को गाँधी से नफ़रत सिर्फ़ इस वजह से है कि वे जवान नहीं हैं, अगर वे जवान होते और अंग्रेजी सूट पहनते तो उनकी इतनी आलोचना नहीं की जाती। लेकिन जहाँ गाँधी सोचते हैं, वहाँ कोई पहुँच पाए तब तो।

    एक और चीज देखिए कि बेचारे गाँधी ही तो हैं जिनके उपर सारे आरोप लगाए जाते हैं, उनके स्मारकों के उपर कचरा साल भर पड़ा रहता है और सभी देखते रहते हैं- गांधी के पक्षधर भी! इस हिसाब से अच्छा ही है कि भगतसिंह के उतने स्मारक नहीं हैं वरन उनके उपर भी 363 दिनों तक गंदगी, मुरझाए सूखे फूल, पक्षियों की गंदगी ही होते!

    गाँधी और भगतसिंह को समग्रता में जोड़कर देखने की जरूरत है।

  9. रेखा says:

    विचारणीय आलेख . टिप्पणी करना थोडा मुश्किल है.

  10. आपका लेख पढ़ा और कमेँट भी लिख लिया है लेकिन स्पीड हल्की है , सो पोस्ट पर पेस्ट न कर पाया।
    आदमी की सोच भी होती है अंदर और इल्हाम भी अंदर ही अवतरित होता है ।
    आदमी की सोच वही बातें बता पाती है जो कि उस ज़माने का रिवाज होती हैं या तब तक खोज ली गई होती हैं । इसके बरअक्स इल्हाम के ज़रिये आदमी बात पहले बता देता है और उनका भौतिक सत्यापन उनके सदियों बाद होता है।
    समय बीतने पर आदमी की सोच ग़लत निकल जाती है जबकि इल्हाम से प्राप्त उसूल समय गुज़रने पर और ज़्यादा प्रासंगिक होते चले जाते हैं ।
    मूल टिप्पणी फिर कभी सही !

  11. Apanatva says:

    sahmat hoo aapke drushtikon se .

  12. सब की आत्मा एक सामान होती है लेकिन सोच हर किसी की अलग अलग होती है

  13. करीब १५ दिनों से अस्वस्थता के कारण ब्लॉगजगत से दूर हूँ
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

  14. ध्यान से सुनने पर आभास होता है कोई स्थाई ध्वनि..उससे कितना भी भागो पुनः खींच लेती है. संभवतः आत्मा की आवाज़ होती है..किसी आवेग में विचारों का क्रियान्वयन आत्मा की आवाज़ नहीं होती है. महीन फर्क समझना सीखना पड़ता है.जो कि ध्यान से ही संभव है ..बस कर के देखो..समझ में आ जाएगी.

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