Believer and non-believer (आस्तिक बनाम नास्तिक)

  
Theism-atheism is the subject of long debate on many blogs. Naturally, many groups surface there. Three major groups are – (1) Believer, (2) Atheists and (3) neither this side nor that side. People are afraid of being branded an atheist. It can appropriately be called ‘religious timidity’.
There is no conclusion on this subject. Comments are pouring in given today. There are more than five hundred comments which is a record in the history of Hindi blogging.
I’ve become an atheist, but atheism in itself is a belief.
In India, belief has disseminated lot of unscientific knowledge. This has harmed this country greatly. Thinking of much larger human groups has lost the edge in the network of theism and religiosity. Science has been pushed to the second place. Ancient knowledge (tribal stories) has been propagated as science.
Agnostic has his own belief. Theist believes in a power which is different from him. An atheist believes in himself. He has faith in available science. The base element is faith. It is beneficial.
Faith gives confidence when we lose hope. It is a psychological fact. Faith increases person’s capacity to recover. It improves the process of healing. Accordingly, it increases the chances of his life. This faith is the proven process. It does not make a difference to belief whether person is a believer or an atheist. It goes on working like a flame.

डॉ दिव्या के ब्लॉग पर नास्तिकताआस्तिकता के विषय पर लंबी बहस छिड़ गई. टिप्पणी दर टिप्पणी आई. स्वाभाविक कई समूह बन गए. तीन प्रमुख रहे– 1. आस्तिक, 2. नास्तिक और 3. कुछ इधर के कुछ उधर के या न इधर के न उधर के. एक बात फिर स्पष्ट हुई कि लोग नास्तिक होते हैं लेकिन स्वयं पर इसका ठप्पा लगने से डरते हैं. इसे भीरूता कहना अधिक उपयुक्त होगा.

इन टिप्पणियों में दूसरे पर इक्कीस पड़ने की प्रवृत्ति भी थी और एक दूसरे को नीचा दिखाने की भी. यह ऐसा विषय है कि इसका अंतिम निष्कर्ष निकलना नहीं था और न निकला. आज की तारीख में भी टिप्पणियाँ आ रही हैं. हिंदी ब्लॉगिंग के इतिहास में साढ़े तीन सौ से अधिक टिप्पणियों का रिकार्ड बन चुका है.
मैं नास्तिक हो चुका हूँ, लेकिन इतनी बहस के बाद नास्तिकता में छिपी आस्तिकता के बारे में एक बात विशेष रूप से यहाँ लिख देना चाहता हूँ.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में आस्तिकता के माध्यम से फैलाया गया अज्ञान देश को बहुत हानि पहुँचा चुका है. बहुत बड़े मानव समूह की सोच आस्तिकताधार्मिकता के तानेबाने में कुंद हुई है. विज्ञान को दूसरे दर्जे पर धकेल कर पौराणिक ज्ञान से ढँका गया जिसका महत्व वास्तव में कबीलाई कहानियों से अधिक नहीं है.
यह कहना भी सही नहीं है कि नास्तिक में आस्तिकता नहीं होती. आस्तिक अपने से अलग सत्ता में आस्थाविश्वास रखता है और नास्तिक स्वयं पर विश्वास करता है और उपलब्ध विज्ञान में आस्था रखता है. तत्त्व हैकिसी पर दृढ़ विश्वास. यह लाभकारी होता है.
कहते हैं कि आस्तिकता तब शक्ति देती है जब व्यक्ति को किसी स्थिति में निराशा घेर ले. मनोविज्ञान की दृष्टि से यह तथ्य है. गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति के भीतर यदि किसी दवा, डॉक्टर, ईश्वर या पास खड़े रिश्तेदार में विश्वास हो आए तो उसमें बीमारी से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है और निरोग होने की प्रक्रिया में सुधार होता है. फलतः उसके जीवित रहने की संभवनाएँ बढ़ती हैं. यह विश्वास की प्रमाणित कार्यप्रणाली है. कोई आस्तिक है या नास्तिक इससे विश्वास को कोई अंतर नहीं पड़ता. वह लौ की तरह है.

 

ये चित्र श्री सज्जन सिंह ने ई-मेल से भेजी हैं:-

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Born on January, 13, 1951. I love my community and country.
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45 Responses to Believer and non-believer (आस्तिक बनाम नास्तिक)

  1. भूषण जी,

    anvarat.blogspot.com/2011/06/blog-post_19.html को देखें जहाँ से मेरी ब्लाग-यात्रा शुरु हुई। वहाँ मैंने नास्तिकता पर अपने विचार विस्तार से व्यक्त किए हैं। लोग नास्तिक कहते हैं और इसी वजह से हमें अपने को नास्तिक कहना पड़ता है। मैं कह चुका हूँ इन विषयों पर जब बहस होगी तो निश्चित रुप से कुछ व्यक्तिगत आक्षेओ लगने ही हैं।

    पौराणिक ग्रन्थों का मेरी नजर में पूरा सम्मान होना चाहिए लेकिन बस साहित्यिक कृतियों की तरह। लोग इन्हें सौ प्रतिशत सच मानकर चलते हैं और नास्तिकों से झगड़ना शुरु कर देते हैं।

  2. Bhushan says:

    @ चंदन जी,
    आपकी टिप्पणी से सहमत हूँ.
    पौराणिक ग्रंथों को सम्मान देने में कोई समस्या नहीं. समस्या (वर्तमान में) वहाँ से शुरू होती है जब उन ग्रंथों के कथ्य को जीवन-शैली का आदर्श नमूना बता कर पेश करने की कवायद शुरू होती है. प्रत्येक व्यक्ति का आदर्श अलग होता है. समस्या आदर्श पर प्रश्नचिह्न लगने से होती है. आपके मन में भी पौराणिक ग्रंथों को लेकर प्रश्न उठे हैं. प्रश्नचिह्नों की निरंतरता को ही आधुनिकता कहा गया है.

  3. जो लोग पौराणिक जीवन शैली के लिए हल्ला मचाते हैं, उनके जीवन को देखें तो वे उसका भी तो पालन नहीं करते। उदाहरण के लिए भोजन, वस्त्र, मकान से लेकर सब कुछ वे अपनाते दूसरों के हैं लेकिन शोर मचाकर भीड़ में शामिल होते हैं।

  4. एक बड़ा सवाल यह भी है की आस्तिक कितने हैं? जो खुद को आस्तिक कहते हैं क्या सच मैं वो दिल से अल्लाह या भगवन के बताए रास्ते पे चलते हैं?

  5. आदरणीय श्री भूषणजी, शेयर करने के लिये बहुत बहुत आभार

  6. मैने देखा है कि जो आस्तिक हैं या खुद को नास्तिक बताते हैं, व्यवहारिक जीवन में उलटा है। संकट की घडी में बडे बडे़ नास्तिकों को मंदिर में सिर झुकाए खड़े देखा है मैने। आस्तिक तो सोचता है कि मेरा भला क्या हो सकता है मैं तो इतना पूजा पाठी हूं। वो अपने को इस भ्रम में अलग रखता है। खैर चार्वाक से बढ़कर कुछ नहीं..

    यावेह जीवेत सुखं जीवेत,
    ऋणं कृत्वा,घृतम पीवेत।

    (जब तक जीओ, सुख से जीओ, उधार लेकर भी घी पियो)

  7. sajjan singh says:

    This comment has been removed by the author.

  8. Jyoti Mishra says:

    As u said its a never ending debate… we can contradict each other for decades but will not get a winner.
    I agree with u that the common thread between both of them is “Belief”.

  9. sajjan singh says:

    ईश्वर है या नहीं यह बहस बहुत पुरानी है शायद जब से धर्म बने हैं । नास्तिकों के मुकाबले आस्तिकों की संख्या निर्विवादित रूप से बहुत ज्यादा है । नवनीत के इस माह के अंक में इस विषय पर कवर स्टोरी छपी है। जिसमें 'इप्सोस' नामक संस्था द्वारा किये गये सर्वे के बारे में दिया गया है इस संस्था ने पूरे विश्व में आस्तिक और नास्तिकों के अनुपात का पता लगाया । इस सर्वे से पता चला है कि ईश्वर में विश्वास करने वाले सबसे अधिक लोगों का अनुपात भारत में है । और जो किसी देवी-देवता में विश्वास नहीं करते उनका अनुपात फ्रांस में सबसे अधिक पाया गया- 39% फिर स्वीडन में 37%, बेल्जियम में 36%, ब्रिटेन में 34%, जापान में 33% और जर्मनी में 21% लोग स्पष्ट ही नास्तिक हैं । यहाँ पर यह बात गौर करने लायक है कि ये सभी देश जहां नास्तिकों की संख्या और देशों के मुकाबले ज्यादा है, विकसित देश हैं जहां पर नागरिक सुविधाएं बेहतर है । जीवन प्रत्याशा अधिक है । इसके प्रमुख कारणों में से एक कारण वहां के लोगों की वैज्ञानिक सोच और जागरुकता भी है । वहां के लोग भारत के लोगों की तरह भाग्यवादी नहीं है । मेहनत का उनके जीवन में प्रमुख स्थान है । इन आंकडों के संदर्भ में भारत की तुलना की जाये जहां साल में 2 या 3 दंगे आम बात है, डायन बताकर औरतों को जलाना भी कोई दुर्लभ खबर नहीं है, ऑनर किलिंग के मामले में तो यह देश विश्व में कुख्यात है ही । इन समस्याओं का प्रमुख कारण भारत में अशिक्षा और लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव भी है । कुछ नास्तिकों का कहना है कि धर्म सब कुछ को जहरीला बनाता है और दुनिया धर्म के बगैर ज्यादा बहतर हो सकती है। मेरा भी मानना यही है । इसलिए जो ईश्वर को मानते हैं वे मानते रहें लेकिन जो नहीं मानते उनकी भी सुननी चाहिए । धर्म ने समाज को सदा से ही विकृत किया है फिर भी इसे मानव समाज के लिए आवश्यक समझा जाता है इसलिए कुछ नास्तिक हमेशा उलझन में रहते हैं

  10. Bhushan says:

    @ Sajjan Singh ji,
    उक्त अमूल्य जानकारी देने के लिए आभार. आपकी टिप्पणी में दिए लिंक्स देखे हैं.

  11. महेंद्र श्रीवास्तव जी,

    नास्तिक को आपने देखा ही नहीं है। वे सब नकली नास्तिक हैं।

  12. Bhushan says:

    @ चंदन जी
    नास्तिक भी नकली हो सकते हैं, यह कथन अच्छा लगा. सहमत हूँ.

  13. Mujhe to lagta hai Astik aur Nastik ke chakkar mein hi nahi padna chahiye.. khamkhaw kee bahas hoti hai aur nateeja kuch nahi…. Vipreet prasthityon mein kab kaun Astik se naastik aur naastik se astik ban jaata hai, is par us samay koi dhayan hi nahi deta..
    Es vishay mein aapka aalekh bahut achha laga..aabhar

  14. Apanatva says:

    🙂

    janha record banane kee baat hai unme kshmata hai aise mudde uthane kee .maine ek kavita likhee thee ek rahee ko le agar izazat ho to aapko bhejoo padkar bataiyega ki vo aastik hai ya nastik .

  15. harina says:

    gud post 🙂 .. superlike 😀

  16. Apanatva says:

    आस्तिक / नास्तिक

    भटका, पथिक
    चलते -चलते
    हताश हो
    रुक गया ।

    विश्वास उसका
    स्वयम से था
    अब पूरी तरह
    उठ सा गया |

    सामने न थी
    उसकी मंजिल
    और ना ही
    कोई था पता । ।

    बड़ी ही दयनीय
    थकी नज़रो
    से ऊपर, शायद
    आसमा को देखा ।

    और बोला
    बहुत हुआ
    अब बस यूं
    और ना सता I

  17. Bhushan says:

    @ Apanatva ji
    टिप्पणी के रूप में आपकी कविता दस पृष्ठों की पोस्ट से अधिक बात कहती है. मुँह से 'वाह' निकल गई.
    आपका आभार.

  18. आस्तिक शब्द संस्कृत के शब्द अस्ति से बना है जिसका अर्थ है ''है''।
    ऐसे ही नास्तिक शब्द संस्कृत के ही नास्ति से बना है जिसका मतलब है ''नहीं है'|
    जो भगवान को नहीं पूजता हो लेकिन गरीबों की सहायता करता हो, देश से,समाज से,परिवार से प्रेम रखता है और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाता है तो ऐसा आदमी नास्तिक नहीं हो सकता।

  19. veerubhai says:

    बहुत ही बेहतरीन विश्लेषण .आस्था हीन प्राणी तो कोई हो ही नहीं सकता .आस्था का केंद्र जुदा हो सकता है .असल बात है आस्था यानी पोजिटिव सोफ्ट वे -यर .पीर फ़कीर पैगम्बरों के पास भी यही सोफ्ट वे -यर मिलता है ताबीज़ गंडे “ई सी टी “भी यही काम करता है . असल बात है यकीन .किसी के होने में ,न होने में .

  20. Bhushan says:

    @ डॉ हरदीप
    आपने कहा है- जो भगवान को नहीं पूजता हो लेकिन गरीबों की सहायता करता हो, देश से,समाज से,परिवार से प्रेम रखता है और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाता है तो ऐसा आदमी नास्तिक नहीं हो सकता। –
    इससे बढ़ कर दूसरी कोई आस्था हो ही नहीं सकती. इसे ही बंदगी कही गया है.

  21. Bhushan says:

    @ Veerubhai
    आपने कहा- असल बात है यकीन. किसी के होने में, न होने में.-
    तत्त्व इसी में छिपा है. यक़ीन. असल बात यकीन है या मान लेना है. गुरुवाणी में कहीं लिखा है 'मनने की गति कही न जाए'.
    आभार.

  22. veerubhai says:

    बहुत कीमती सुझाव है भूषन जी ,परिपक्व भी .शुक्रिया .

  23. sajjan singh says:

    “नास्तिक” शब्द का नकारात्मक अर्थ क्यों लगाया जाता है। क्यों यदि कोई नास्तिक होकर मानवता, परोपकार में विश्वास रखता है तो उसे नास्तिक न मानकर आस्तिक कहा जाता है । क्या नास्तिक शब्द बुरा है। यह तो उस चीज का नकार है जो है ही नहीं। अंग्रेजी में नास्तिक के लिए Atheist और आस्तिक के लिए Theist शब्दों का प्रयोग किया जाता है। नास्तिकों को मानवतावादी, प्रकृतिवादी,तर्कवादी, अनीश्वरवादी, भौतिकतावादी (ध्यान रहे भौतिकतावादी और भौतिकवादी में फ़र्क होता है) आदि नामों से भी पुकारा जाता है । क्या “आस्तिक” शब्द ही सदाचार का पर्याय है आम जीवन में आस्तिक कितना सदाचार का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और यदि करते हैं तो क्या आस्तिक होने की वजह से करते हैं उनके लिए नैतिकता के कोई मायने नहीं हैं। स्वयं में आस्था या विश्वास का आस्तिक या नास्तिक होने से कोई संबंध नहीं है क्योंकि साधारण अर्थों में इन शब्दों के मायने अलग हैं। इसलिए न नास्तिक बुरे है और न नास्तिक शब्द ही बुरा है।

  24. Bhushan says:

    पी.एन. सुब्रमणियन जी ने यह टिप्पणी ई-मेल से भेजी है.
    PN Subramanian ✆ to me
    show details 09-07-2011 9:20 AM

    पौराणिक ज्ञान से ढँका जाना संभवतः बहुसंख्यक अशिक्षित जनसँख्या को मद्देनजर तत्कालीन बुद्धि जीवियों को भाया रहा होगा. वह उस काल की एक कपटयुक्त नीति तो रही ही है.

  25. Bhushan says:

    @ Sajjan Singh ji
    *क्या “आस्तिक” शब्द ही सदाचार का पर्याय है आम जीवन में आस्तिक कितना सदाचार का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और यदि करते हैं तो क्या आस्तिक होने की वजह से करते हैं उनके लिए नैतिकता के कोई मायने नहीं हैं।
    मैं आपके इस कथन को महत्व देता हूँ.
    जहाँ तक नास्तिक शब्द के बुरा होने का संबंध है इतना ही कहूँगा कि कई प्रकार के जातिसूचक शब्द घृणा का पर्याय बना दिए गए. नास्तिक शब्द के साथ भी भारत में ऐसा ही किया गया जो एक विशेष प्रकार की मानसिकता से चालित है. इस बारे में ग़ालिब का एक शेर याद आ रहा है-
    देह्र में नक़्श-ए-वफ़ा, वजहे तसल्ली न हुआ,
    है ये वो लफ़्ज़ जो शर्मिन्दा-ए-मानी न हुआ.

    (इस दुनिया में वफ़ा एक बे-मायनी लफ़्ज़ है. वफ़ा के नक़्श (तस्वीर) से ज़माने में किसी को तसल्ली न हुई. वफ़ा एक ऐसा लफ़्ज़ है जिसे अपने मफ़हूम (भाव, उद्देश्य) से कभी शर्म न आई.)

    लक्ष्य मानवीयता है तो नास्तिक होने में अच्छाई ही है.

  26. किसी चीज़ को बार-बार नकारना भी उसे स्वीकारना है।

  27. Bhushan says:

    @ हास्यफुहार,
    'बार-बार नकारना' स्वतः ही 'सुमिरन' बन जाता है. आपने मन की गूढ़ कार्यप्रणाली का उल्लेख किया है. आपका आभार.

  28. sajjan singh says:

    धर्म और विज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। धर्म इस जगत को समझने का पुरातनकालीन प्रयास है तो विज्ञान आधुनिक। धर्मों में लिखा हुआ शाश्वत सत्य नहीं है, ईश्वर भी धर्मों की ही कल्पना है। विज्ञान ने धर्मग्रन्थों की ज्यादातर बातों को ग़लत सिद्ध कर दिया है। विज्ञान ने इस जगत को ईश्वर के पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर समझने की कोशिश की और यह साबित कर दिया की यह जगत बिना किसी के बनाये ही अस्तित्व में आ सकता है इसके लिए किसी क्रियेटर की आवश्यकता नहीं है। लेकिन फिर भी ज्यादातर लोग धर्म ग्रन्थों को ही सत्य माने बैठे हैं। ईश्वर के पेट में पता नहीं कौनसा अमृत है कि वो मरता ही नहीं है हमारे देश मे जैसे-जैसे विज्ञान-तकनीक और आधुनिकता का विकास होता जा रहा है। उसके साथ ही धार्मिक ढ़ोंग धतूरे भी बढ़ते ही जा रहे हैं। धर्मांधता बढ़ती ही जा रही है जिसका विरोध खुद राजेन्द्र यादव जिनके यह शब्द हैं “किसी चीज़ को बार-बार नकारना भी उसे स्वीकारना ही है” अपने लेखन के माध्यम से सालों से कर रहे हैं और आज 89 बरस की उम्र में भी थके नहीं है। उनके इतने सालों के नकार की चित्कार भी सोये हुओ को जगा नहीं पाई।

  29. सज्जन जी,
    किसी बात को बार-बार नकारना उसे स्वीकारना है। यह सब कहावत यहाँ बोलने लायक नहीं हैं। सत्य और चिंतन से निकली बात ध्यान देने लायक है न कि किसी ने कह दिया और वाक्य के पीछे पड़ गए।

    आखिर किसी चीज को बार बार नकारने की जरूरत पड़ती क्यों हैं? यह कोई सोचता नहीं। बस उपदेश के शन्द दुहराने से क्या होगा? अगर मेरा नाम चंदन है और यह सत्य है तब इस बात को बार-बार नकारने का अर्थ क्या है? यही कि मेरे नाम के बारे में आपको संदेह है। आप सच जानना चाहते हैं और समय-समय पर सत्य से कथित सत्य का मिलान करके देखते हैं। यहाँ कोई यह नहीं समझाने लगे कि मेरा नाम चंदन है, यह मेरा नाम है और आत्मा आदि…।

    बार बार सवाल उठाने का अर्थ है कि जिसपर सवाल उठाया जा रहा है वह बार बार सवाल उठाने के लिए जगह छोड़ रहा है। और कहीं न कहीं कमी है। वरना बात हमेशा के लिए कब की खत्म हो चुकी होती।

    ज्यादा कहा तो यहाँ बहस हो सकती है लेकिन नहीं होगी। क्योंकि ऐसे मानसिक लक्षण तो यहाँ नहीं दिखते कि अनंत बहस चल पड़े।

    अन्त में राजेन्द्र यादव की उम्र 89 नहीं 79 साल सम्भव है।

  30. ZEAL says:

    .

    आदरणीय भूषण जी ,

    मेरे विचार तो आपने मेरी पोस्ट पर पढ़े ही हैं , इसलिए उनको पुनः यहाँ लिखने का औचित्य नहीं लगता. मैं आस्तिक हूँ और एक 'सर्व व्यापी tatha सर्वशक्तिमान सत्ता' में विश्वास रखती हूँ. वही सृष्टिकर्ता एवं सबसे बड़ा वैज्ञानिक भी है मेरी नज़र में . आजकल शिक्षा प्राप्ति के बाद नवोदित वैज्ञानिक , अपनी पूरी शक्ति से उस परम वैज्ञानिक की सृष्टि को samajhne का प्रयास मात्र कर रहे हैं , जो सराहनीय है.

    मेरे विचार से , एक सत्ता aisi अवश्य है जो सर्व शक्तिमान है और सर्व व्यापी भी है . इसीलिए मुझे कण-कण में और प्रत्येक व्यक्ति में मुझे ईश्वर के दर्शन होते हैं .

    हम सभी मनुष्य तो नाशवान हैं . इस रंगमंच पर अपना अपना कौशल दिखाकर एक दिन वापस उसी अनंत , आदिशक्ति में विलीन हो जायेंगे. ईश्वर का अंशमात्र होने के कारण हम कभी भी उस सत्ता की समुचित तौर पर व्याख्या नहीं कर सकेंगे.

    सभी आस्तिक एवं नास्तिक टिप्पणीकारों को नमन , क्यूंकि हम सभी उसी परम-सत्ता का अंश हैं .

    .

  31. sajjan singh says:

    धर्मों पर एक पोस्ट यहां भी लगी है-

    धर्म मानव के लिए है. या मानव धर्म के लिए

  32. Bhushan says:

    @ ZEAL
    डॉ. दिव्या जी, आपका ब्लॉग पर लौटना मेरे लिए खुशी की बात है.

    मेरा नज़रिया यह है कि किसी शक्ति को सर्वशक्तिमान मान लेना प्रत्येक व्यकित का अधिकार है. इसके लाभ भी हैं. मेरे नजरिए से मुश्किल वहाँ है जहाँ उस सत्ता के नाम पर लोगों का शोषण होता है या मानव समूहों के सिर कटते हैं.

  33. रेखा says:

    मूल रूप से हम सभी आस्तिक ही है . आस्तिक व्यक्ति प्रकृति की हर चीज़ में विश्वास करता है. उसका यह विश्वास या सकारात्मक विचार ही उसे रचनात्मक बनाता है.

  34. बहुत बहस हुई ……. उसके होने या न होने की

    मेरे विचार से तो …'अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयं
    परोपकाराय पुण्याय पापाय परिपीडनं'

    परहित सरिस धरम नहि भाई
    पर पीड़ा सम नहि अधमाई

  35. आदरणीय भूषण जी,
    नमस्कार !
    नास्तिक सच मानकर चलते हैं बहुत ही बेहतरीनशेयर करने के लिये बहुत बहुत आभार

  36. अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

  37. आस्तिक-नास्तिक की अवधारणा का अच्छा विश्लेषण किया है आपने।
    आस्तिक, नास्तिक और ईश्वर की परंपरागत परिभाषा में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस कर रहा हूं।

  38. Bhushan says:

    @ Dr. Divya
    डॉ. दिव्या, आप आस्तिक हैं और एक सर्वशक्तिमान सत्ता में विश्वास रखती हैं. यह सकारात्मक गुण है. समस्या उन्हें होती है जो अपने भीतर कोई भी विश्वास नहीं जगा पाते. समस्या उनसे होती है जो अपना विश्वास बलात् दूसरों पर थोपने का प्रयास करते हैं.
    @ Mahendra Verma Ji
    आपकी भावना अपूर्व है. कोने में बैठी मानवीयता को पहचाना जाए यही कामना है.

  39. ZEAL says:

    .

    भूषण जी ,

    विश्वास ही तो सबसे बड़ी बात है , चाहे ईश्वर में हो , चाहे माता -पिता में , चाहे किसी शुभचिंतक में हो , हम उसी से हिम्मत और ऊर्जा प्राप्त करते हैं , और जिससे हाँ ऊर्जा प्राप्त करते हैं , उसी में आस्था बढती जाती है और हम उसे अपने से श्रेष्ठ और सर्वशक्तिमान मान लेते हैं. लेकिन जो जो लोग स्वयं को ही श्रेष्ठ समझते हैं , उनका अहंकार पोषित होता रहता है.

    ईश्वर निराकार है , आस्था रखने वालों को किसी भी रूप में मिल सकता है , ईश्वर के स्मरण से ऊर्जा मिलती है क्यूंकि वो एक शक्तिपुंज है.

    रही बात किसी पर अपने विचारों को थोपना , तो यह सर्वथा अनुचित है. जिसे मीठा पसंद है उसे जबरदस्ती नमकीन नहीं खिलाया जा सकता .

    .

  40. सदियों से इस मुद्दे पर बहस होती आई है.जिसकी जो आस्था है वो समझौता करने को राज़ी नहीं है. इस पर बहस करना उर्जा व्यर्थ करना है.

  41. veerubhai says:

    संवाद तो चल ही रहा है आस्था और अनाश्था के पैरोकारों के बीच .ये क्या कम है .

  42. Pallavi says:

    मैं (कविता रवात),जी की बात से पूर्णरूप से सहमत हूँ,कि कोन नास्तिक है और कोन आस्तिक इस विषय में पढ़ने का कोई मतलब ही नहीं है। सिर्फ बहस के लिए ये मूदा अच्छा है। लेकिन परिस्थियों के अनुसार व्यक्ति का स्वभाव बदलता आया है और आगे भी बदलता रहेगा…. धन्यवाद

  43. Rattan Gottra says:

    The world over, both the theistic and anti-theistic arguments are inconclusive. However, for the human beings, it is possible to think, and experience in both religious, as well as naturalistic/scientific ways to be a part of the universe on this planet. We are facing an issue of the fact, which at present, is veiled in ambiguity, so that both belief and dis-belief carry with them the risk of profound error. However, while keeping in view the individual freedom, those who have the inclination/desire to believe must be rationally allowed by human society the 'right to believe' in theistic, anti-theistic, or agnostic faiths of their respective choices, provided nobody's faith interfers/disrupts the overall promotion of the welfare of humankind; particularly because religion/faith is for humanity and not humanity for religion.
    To promote understanding/cooperation among all human-beings, there should be continuous inter-faith dialogue. However, historically and even now currently, both the religious leaders and the ruling classes have seldom cooperated on the subject due to their selfish interests aimed at exploiting the credulity of masses. In India, they even went to the extent of sanctification of slavery for their brutal exploitation of the toiling masses. Would you consider the exploiters as theists? If you consider them as theists, the toiling masses, with the spread of higher education and modernity are likely to feel the inclination towards becoming athiests or agnostics.

  44. Bhushan says:

    @ Rattan Gottra Ji
    *In India, they even went to the extent of sanctification of slavery for their brutal exploitation of the toiling masses. Would you consider the exploiters as theists? If you consider them as theists, the toiling masses, with the spread of higher education and modernity are likely to feel the inclination towards becoming athiests or agnostics.

    This is great comment. Thanks so much.

  45. aarti says:

    Jo nastik hai wo mante hai ki jo kuch bhi nature se bna hai wo apne ap ban gya hai jra dimag lgao agr sb kuch apne ap hi ban rha hota to human bodies and different living things apne ap kese ban skti hai.kuch to hai jo decide krta hai nature se ek ladka or ek ladki bnane hai jis se age or log honge..aise hi others honge sb kuch apne ap ho rha hota to itne systematic tarike se sb kese ho skta hai..agr bhagwan hai hi nai to achai ki raah pe chalne wlo ke dil me khushi kyu ati hai..burai krke uska dil kyu santusht nahi hota..koi to hai jo achai krne wlo k sth hai. Sch to ye hai bina bagwan k astitv ke duniya chal hi nai skti.jese bina govt ke desh nhi chal skta waise hi bina god ke universe nhi chal skta..

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