Spects for future – भावी का चश्मा

अभीअभी मैंने खिड़की से छः बच्चियों को स्कूल यूनिफ़ार्म में साइकिल से जाते देखा है. बच्चों का स्कूल जाना आम नज़ारा है लेकिन इसमें ख़ासियत थी कि सभी बच्चियों को चश्मा लगा था. अजीब सा लगा. स्कूल के बाहर शायद उनकी संख्या का दृश्य और भी बड़ा होता. थोड़ा पुराने विचारों का हूँ सो सबसे पहले इनकी शादी का विचार आया. सास सोचेगी कि सुई में धागा डाल पाएगी या नहीं. होने वाला पति ऐनक पर बिफरेगा या चश्मे का नंबर पूछेगा. चश्मे के फ्रेम की क़ीमत याद आई तो गांधी जी के चश्मे का फ्रेम याद आया. 1967 में वैसा एक फ्रेम मैंने दो रुपए में खरीदा था. अब एक सुन्दर फ़्रेम तीन हज़ार रुपए में आएगा. सासससुर हस्तक्षेप करेंगे.

सोचता हूँ ये बच्चियाँ हरी पत्तियाँ खाती हैं क्या? या विटामिन कैप्सूल के निरंतर प्रयोग से स्वयं को बचाए हैं. खाने में इन्हें जो फलसब्जियाँ मिलती हैं वे इंजैक्शन वाली तो नहीं? उनके साइड इफ़ेक्ट मैं जानता हूँ.

शायद कुछ ज़्यादा सोच गया. सोचना तो यह भी चाहिए कि कहीं इतनी सारी ऐनकें हमारी शिक्षा प्रणाली की देन तो नहीं? इंजैक्शन वाले फलसब्जियां हमारे भ्रष्ट तन्त्र का हिस्सा तो नहीं बन गईं? जिन दुधारू पशुओं को इंजैक्शन लगाकर अधिक दूध लिया जाता था उनके शव खाकर गिद्धों के गुर्दे फ़ेल हो गए. भारत से गिद्ध लुप्त हो गए. अब पिंजौर के पास कहीं इनकी नर्सरी खोली गई है. एक लुप्त पक्षी को वापस लाने के लिए नर्सरी खोलनी पड़ी. हम इन्सानों के साथ क्या कर रहे हैं? एक ही उम्मीद है कि नई पीढ़ी चश्मे के सहारे से ही सही, इंसान की नस्ल के भविष्य को बेहतर देखेगीबेहतर बनाएगी.

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25 Responses to Spects for future – भावी का चश्मा

  1. ਭੂਸ਼ਣ ਜੀ,
    ਬਹੁਤ ਹੀ ਵਿਚਾਰ ਕਰਨ ਵਾਲ਼ਾ ਮੁੱਦਾ ਉਠਾਇਆ ਹੈ….

    ਮੈਨੂੰ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਇਹ ਐਨਕ ਸਾਡੇ ਅੱਜਕਲ ਦੇ ਖਾਣ-ਪਦਾਰਥਾਂ ਦਾ ਹੀ ਨਤੀਜਾ ਨੇ। ਮਿਲਾਵਟੀ ਭੋਜਨ ਨੇ ਕਿਧਰੇ ਤਾਂ ਰੰਗ ਦਿਖਾਉਣਾ ਹੀ ਹੈ…ਪਰ ਏਸ ਮਿਲਾਵਟ ਦੇ ਨਤੀਜਿਆਂ ਨੂੰ ਵੇਖਣ ਵਾਲ਼ੀਆਂ ਅੱਖਾਂ …ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕਦੋਂ ਖੁਲਣਗੀਆਂ। ਜੋ ਮਿਲਾਵਟ ਕਰਕੇ ਧਨਾਢ ਹੋਣ ਦੀ ਦੌੜ 'ਚ ਲੱਗੇ ਹੋਏ ਨੇ ਕੀ ਓਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਬਾਲ-ਬੱਚੇ ਨਹੀਂ ਹਨ?
    ਬਹੁਤ ਦਰਦ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਅਜਿਹਾ ਕੁਝ ਪੜ੍ਹ/ਸੁਣ ਕੇ …?
    ਕਿਓਂ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ-ਆਪ ਨੂੰ ਹੀ ਮਾਰਨ 'ਤੇ ਤੁਲੇ ਹੋਏ ਹਾਂ ?
    ਬਹੁਤੀਆਂ ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹਨ ਨਾਲ਼ ਤਾਂ ਐਨਕ ਲੱਗਣੀ …?? ਅਜੇ ਵੀ ਸੱਚ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ…ਹਾਂ ..ਜੇ ਇਹੀ ਬੱਚੇ ਪੜ੍ਹਨ ਦੇ ਬਹਾਨੇ..ਕੰਪੂਟਰ 'ਤੇ ਖੇਡਾਂ ਖੇਡਦੇ ਨੇ ਜਾਂ ਟੀ. ਵੀ. ਵੇਖਦੇ ਨੇ ਦਿਨ 'ਚ ਛੇ-ਛੇ ਘੰਟੇ…ਤਾਂ ਅੱਖਾਂ 'ਤੇ ਅਸਰ ਹੋਣਾ ਸੁਭਾਵਿਕ ਹੈ ।
    ਸੋ ਰਲ਼ਿਆ-ਮਿਲ਼ਿਆ ਨਤੀਜਾ ਇਹੀ ਹੇ ਕਿ ਸਾਡੇ ਅਜੋਕਾ ਰਹਿਣ-ਸਹਿਣ ਏਸ ਦਾ ਕਾਰਨ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ….ਏਸ ਤੋਂ ਤਾਂ ਕੁਝ ਹੱਦ ਤੱਕ ਬਚਾ ਵੀ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ..ਪਰ ਅਸੀਂ ਕਰਦੇ ਨਹੀਂ।
    ਹਾਂ ਮਿਲਾਵਟੀ ਭੋਜਨ ਖਾਣਾ ਤਾਂ ਕੋਈ ਵੀ ਪਸੰਦ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ…ਓਥੇ ਕਿਸੇ ਦੀ ਵਾਹ ਨਹੀਂ ਚੱਲਦੀ…ਇਸ ਨੂੰ ਹੱਲ ਕਰਨ ਲਈ ਤਾਂ ਕੋਈ ਵੱਡੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਮੁਹਿੰਮ ਚਲਾਉਣ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ…ਸਿਰਫ਼ ਮੇਰੇ ਵਰਗੇ ਨੇ ਦੋ ਲਾਈਨਾਂ ਟਾਈਪ ਕਰ ਦਿੱਤੀਆਂ…ਭੂਸ਼ਣ ਜੀ …ਏਸ ਟਿੱਪਣੀ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹ ਕੇ ਜਾਂ ਤੁਹਾਡੀ ਪੋਸਟ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹ ਕੇ … ਦੋ ਚਾਰ ਜਣੇ ( ਕੁਝ ਹਾਂ ਪੱਖੀ ਤੇ ਕੁਝ ਨਾ ਪੱਖੀ ) ਹੁੰਗਾਰਾ ਭਰ ਦੇਣਗੇ…ਤੇ ਫੇਰ ਪਰਨਾਲ਼ਾ ਓਥੇ ਦਾ ਓਥੇ ਹੀ ।

    ਹਰਦੀਪ

  2. Bhushan says:

    ऊपर डॉ हरदीप की पंजाबी टिप्पणी का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है:-

    डॉ. हरदीप संधु said…
    भूषण जी,
    बहुत ही विचारणीय मुद्दा उठाया है….

    मुझे लगता है यह ऐनक हमारे आजकल के खाद्य-पदार्थों का ही परिणाम है. मिलावटी भोजन ने कहीं तो रंग दिखाना ही है…लेकिन इस मिलावट को देखने वाली आँखें…पता नहीं कब खुलेंगी. जो मिलावट करके धनाड्य बनने की दौड़ में लगे हैं क्या उनके बाल-बच्चे नहीं हैं?

    बहुत पीड़ा होती है ऐसा कुछ पढ़/सुन कर… ?
    क्यों हम अपने आप को ही मारने पर तुले हुए हैं?
    बहुत पुस्तकें पढ़ने से तो ऐनक लगेगी… ? ? अभी भी सच नहीं आता…हाँ..यदि यही बच्चे पढ़ने के बहाने ..कंप्यूटर पर खेल खेलते हैं या टी.वी. देखते हैं दिन में छह-छह घंटे…तो आँखों पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है.

    सो मिला-जुला नतीजा यही है कि हमारा ऐसे रहन-सहन इसका कारण हो सकता है…इससे तो कुछ सीमा तक बचाव हो सकता है..लेकिन हम करते नहीं.
    हाँ मिलावटी खाना तो कोई भी खाना पसंद नहीं करता…वहाँ किसी की पेश चलती…इसे हल करने के लिए तो किसी बड़े स्तर की मुहिम चलाने की आवश्यकता है…केवल मेरे जैसे ने दो लाइने टाइप कर दीं…भूषण जी…इस टिप्पणी को पढ़ कर या आपकी पोस्ट को पढ़ कर…दो-चार जन (कुछ हाँ के पक्ष में कुछ न के पक्ष में) हुँकार कर देंगे…और फिर परनाला वहीं का वहीं.

    हरदीप
    3:38 AM

  3. Jyoti Mishra says:

    इतनी सारी ऐनकें हमारी शिक्षा प्रणाली की देन तो नहीं?
    No not at all 😀
    It is the result of fast food which we ingest instead of the nutritious one(which I swear tastes bad… Irony is every thing which tastes good is not healthy).

    an I hope the same that the digital generation will do something positively progressive.

    Nice read !!!

  4. Pallavi says:

    आपने बेहद अच्छा मुदा उठाया है, विचारनिये पोस्ट …और आप कि पोस्ट पढ़ कर मुझे तो नहीं लगता कि आप पूराने ख्यालों के हैं। खैर आप ने जितने भी बिन्दुओं पर प्रकाश डालने कि कोशिश कि है वो सभी कहीं न कहीं उन बच्चियों पर लगे एनकों के जिम्मेदार हैं। चाहे वो हमारी शिक्षा प्रणाली हो, या फिर खाने पीने में आए बदलाव, फिर चाहे वो fashion के चलते आये हों, या पौष्टिक खाना ना मिलने के अभाव में,और रही बात शादी के समय उठने वाले प्रशनों कि तो उसका तो सवाल ही नहीं उठता क्यूंकि यदि चश्मे लगने ही हैं तो केवल लड़कियों पर ही नहीं लड़कों पर लगेंगे….इतनी अच्छी पोस्ट प्रस्तुत करने के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद। सचमुच्च विचार करने लायक हैं आप कि बातें….

  5. इस मुददे पर तो आज तक किसी का ध्यान ही नहीं गया…!!!
    आपने सामाजिक स्वास्थ्य के एक महत्वपूर्ण बिंदु की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है। इसमें शिक्षा प्रणाली का दोष तो नहीं दिखता, फास्ट फूड का फैशन और माता-पिता की लापरवाही इस समस्या के लिए जिम्मेदार हैं। प्राकृतिक खाद्य पदार्थ भी कृत्रिम जैसे हो गए हैं।
    आगे चलकर यह एक गंभीर समस्या बन सकती है।
    शासन और स्वयंसेवी संस्थाओं को इस दिशा में कुछ करना चाहिए।

  6. Vivek Jain says:

    विचारणीय पोस्ट,
    आभार,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

  7. सारी बीमारियाँ खान-पान में मिलावट के कारण है और ये मिलावट भ्रस्टाचार के कारण है.अब तो हम सब का अल्लाह मालिक है.

  8. आदरणीय भूषण जी,
    शिक्षा पद्धति से तो इसके होने की उम्मीद कम है। वैसे पीठ पर एक क्विंटल का बोझा तो कु-शिक्षा की देन है ही।

    चश्मा तो मुझे भी मिला था लेकिन इतना लापरवाह हूँ कि दवा 2009 सितम्बर में डाक्तर ने दिया, उसे आज तक नहीं खोला। ठीक उसी तरह चश्मा तो शायद ही पहनता हूँ जबकि आँखों में समस्या है।

    कुछ अच्छे विचार हमेशा पुराने खयाल के कहे जाते हैं जैसे हिन्दी की बात। देश की बात आदि।

    कुछ शिकायतें हैं।
    पहली की हरदीप जी हिन्दी लिख सकती हैं तब पंजाबी यानि गुरुमुखी क्यों लिखती हैं? जबकि यह हिन्दी ब्लाग है और आप, हम, वे सब हिन्दी समझ सकते हैं।

    दूसरी आपसे है कि आप हिन्दी के अलावे अंग्रेजी बिलकुल नहीं लिखें। जहाँ तक सम्भव हो अंग्रेजी एक एक अक्षर से भी बचें। जैसे शीर्षक में अंग्रेजी है, उसे न रखें। सम्भव हो तो ब्लाग की भाषा हिन्दी कर दें। यह विनती है।

  9. Bhushan says:

    @ चंदन कुमार मिश्र जी,
    आपकी भावना स्वागत योग्य है. जहाँ तक हरदीप जी का प्रश्न है भाषा का चुनाव उनकी व्यक्तिगत वरीयता है. मैंने उसका हिंदी अनुवाद करना ठीक समझा.
    पहले मैं सारी पोस्ट हिंदी में ही लिखता था.अंग्रेजी में शीर्षक लिखने का एक महत्व मैंने अनुभव से सीखा है. कई बार चुनिंदा अभिव्यक्तियों को अंग्रेज़ी में ढूँढना आसान होता है जब आप किसी और सिस्टम पर बैठे हों जिस पर हिंदी टंकण की सुविधा न हो. मेरे दो-एक आलेखों पर अँग्रेज़ों ने टिप्पणी की है. वे अपने विषय को इस लिए ढूँढ पाए क्योंकि वह अंग्रेज़ी में था और गूगल अनुवादक की मदद से वे उसे कुछ न कुछ समझ पाए. उन आलेखों का बाद में अंग्रेज़ी अनुवाद भी मैंने उन्हें ई-मेल से भेजा.
    अपनी भाषा से प्रेम स्वाभाविक है. 'अंग्रेजी के एक एक अक्षर से भी बचें' वाली बात हमारे मन में क्यों आए बंधु. मेरा विचार है आपने अंग्रेज़ी पढ़ी है और उसके माध्यम से काफी सीखा है. अंग्रेज़ी की शब्द संपदा को हम हिंदी में जितना शामिल कर सकें उतना हिंदी के लिए अच्छा है. आशा है आप इस बात से सहमत होंगे. अब सहमत हो भी जाइए न.

  10. Babli says:

    बहुत ही बढ़िया, शानदार और विचारणीय पोस्ट ! हमारे देश में सभी खाने में मिलावट होती है और सिर्फ़ इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के कारण भी गहरी समस्या आ गयी है जो दूर होने पर ही हमारा देश आगे बढ़ पायेगा! लाजवाब पोस्ट!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

  11. S U N D A R……..P O S T

    PRANAM

  12. सदा says:

    बहुत ही सार्थक लेखन …।

  13. मिलावट का ही जमाना है.भावना तक में मिलावट आ गई है.अब तो भगवान ही मालिक है.
    सार्थक पोस्ट.

  14. ekdam sahi lkha hai aapne ek to bade bag wali badi tucchi padhai aur upar se injection wala aahaar, abhi to school jane wali bacchiyon ko chasma laga hai bhavishy me ho sakta hai ki paida hone ke saath hi bachhe ko chasma lag jaye…
    bahut badhiya lekh …..
    lekin log padh lenege tippani kar denge lekin kabhi iske virodh me kabhi nahi aayenge, shayad rojiroti ne hame itna uljha jo rakhaa hai ….

  15. veerubhai says:

    भूषन जी बहुत बढ़िया विमर्श चल रहा है सभी बातें करीब करीब कह दी गईं हैं ,चन्दन कुमार मिश्र जी की एक बात अच्छी नहीं लगी जब चस्मा नंबर से मिला है तो लगाते क्यों नहीं ?दवा है यह तो ,नहीं लगायेंगें तो बीनाई(विजन ) पर बन आएगी .यह एक निहायत अ -वैज्ञानिक दृष्टि कौन है .और हाँ गर्भसे ही हमारे यहाँ खान-पान सम्बन्धी वर्जनाएं आ पसर्तीं हैं .जबकी प्राथमिक आहार गर्भस्थ का वही होता है जो माँ ग्रहण करती है .गर्भकाल में पपीता खाने से बचा जाता है एक वर्जना और अंध विश्वास के तहत ,इससे कोई गर्भ पात नहीं होता है पील फल और तरकारियाँ विटामिन ए का अच्छा स्रोत हैं .एक गाज़र रोज़ खाइए बारह मासा मिलती है नारंगी विलायती गाज़र .बीनाई बढ़िया रहेगी .बच्चे ब्रेक -फास्ट भी नहीं करते हैं ,दूध नहीं पीते हैं .पुष्टिकर तत्वों की कमी से जुडी है सेहत की नव्ज़.आँख की भी .बेहतरीन पोस्ट और ला -ज़वाब चिंतन चश्मे से भारत की दुर्दशा बयान कर दी आपने .बहुत खूब .

  16. sm says:

    thoughtful post

  17. सर आपने चश्‍मे की भाषा में बहुत कुछ कह दिया अच्‍छा लिखा है आपका लेख पसंद आया

  18. Bhushan says:

    @ कश्‍यप पब्लिकेशन,
    आपका आभार आने और टिप्पणी करने के लिए.

  19. Bhushan says:

    @ veerubhai Ji
    आपके सुझाव अमूल्य हैं आँखों के लिए. आपका आभार.

  20. Bhushan sir, kitna saara soch liya…. 🙂 bahut achcha laga lekh pad kar, shaayad unke mata-pita ne bhi itna nahi socha hoga…

  21. वीरुभाई जी,

    आपकी सलाह पर ध्यान दूंगा। आँखों की बात लापरवाही लायक नहीं है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

  22. Nirmal says:

    nice article, (on philosophical side) it is not important how you see but its important what we see, if we can see the truth with glasses, then no harm in using a glass.

  23. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

  24. भूषन जी बहुत बढ़िया बेहतरीन पोस्ट चश्मे से भारत की दुर्दशा बयान कर दी आपने ……

  25. सही खान-पान तो मायने रखता ही है परन्तु कुछ बच्चों के आँखों की बनावट ही अलग होती है जिसके कारण चश्मा लगाना पड़ता है .

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