Aarakshan- मध्यवर्गी समाज और गरीबों के पैसे का भक्षण

हम फिल्म बनाते हैं.  विवाद है तो आप जाने…
स्कूल के दिनों के बाद आज यह मुहावरा प्रयोग कर रहा हूँ-  खोदा पहाड़ और निकली चुहिया. कल टीवी चैनलों पर हुई बातचीत और इस फिल्म के जानकार लोगों की चर्चा से स्पष्ट हो गया कि फिल्म का थीम भारत सरकार की आरक्षण नीति न हो कर शिक्षा का व्यवसायीकरण है और कि प्रकाश झा ने विवाद और पैसा बटोरने के लिए फिल्म का नाम ‘Aarakshan’ (आरक्षण) रखा है.

तीन राज्यों में इस फिल्म के प्रदर्शन पर लगी रोक के दबाव में प्रकाश झा फिल्म के आपत्तिजनक डायलॉग हटाने पर सहमत हो गए हैं. इस बीच मीडिया इस फिल्म का विज्ञापन बना रहा और सनसनी फैलाता रहा. लगा जैसे यह फिल्म मंडल कमिशन रिपोर्ट जैसा अकस्मात विस्फोट करेगी. लेकिन पहले से काफी जागरूक मध्यवर्गी समाज जानता है कि यह मनोरंजन है. अलबत्ता मनोरंजन और सनसनी ढूँढने वाले लोगों की जेबों से पैसा जाएगा हमेशा की तरह. 

क्योंकि फिल्म शिक्षा के व्यवसायीकरण पर है अतः मुहावरा ठीक करता हूँ- …निकली चुहिया…लेकिन हाथी जैसी. फिल्म का यह पक्ष स्वागत योग्य है. 

कुछ बातें आज शाम को मालूम हो जाएँगी.


ऑफ़िशियल ट्रेलर. पता नहीं इसमें गाना क्यों नहीं है.

8.56 सायं 

एक युवा दर्शक (एक छात्रा) की पहली प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है. उसने जो देखने की उम्मीद की थी वह सब फिल्म में नहीं था. वह निराश है. उसके अनुसार फिल्म फ़्लॉप भी हो सकती है.

मेरी प्रतिक्रिया है कि यदि दर्शकों ने ऐसा महसूस किया है तो फिल्म चलाने के लिए आरक्षण के नाम पर किया गया उन्मादी प्रचार समाज की भावनाओं के साथ खिलवाड़ था.


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14 Responses to Aarakshan- मध्यवर्गी समाज और गरीबों के पैसे का भक्षण

  1. प्रकाश झा के बारे में कहा जाता है कि वे वास्तविक फिल्म बनाते हैं। लेकिन इसका लाभ क्या मिलता है समाज को? अपहरण हो या गंगाजल या महाभारत से चुराई गई और रद्दी फिल्म राजनीति, आखिर दिखाते हैं ये लोग। मुझे लगता है अब सिनेमा पर तेज प्रतिबन्ध होना चाहिए क्योंकि इतनी फिल्में बन चुकी हैं कि उन्हें देखने में जीवन गुजर जाय। और वैसे कोई भी कोई रचनात्मक करे तब तो, बस सनसनी फैलाकर पैसा ऐंठना ही तो उद्देश्य है। चले हैं शिक्षा के व्यवसायीकरण पर फिल्म बनाने। जरा इन लोगों से पूछा जाय कि समाज में इनका योगदान क्या है इस समस्या के समाधान के लिए? बस अरबों की आमदनी हो जाएगी और हो गया समाधान।

  2. Bhushan says:

    @ चंदन कुमार मिश्र
    आपका आक्रोश मैं समझ सकता हूँ.

  3. nitinvinzoda says:

    Dharmachar Bhushanji..very good post on Arakshna.. it is not reservation but BHAKSHAN…

  4. veerubhai says:

    भाई साहब ,गाना दिखाने से नकली गाम्भीर्य का असर घट जाता ,लेकिन फिल्म पर प्रतिबन्ध रोपना राजनीति खोरों का मायोपिक विज़न ही मुखर करता है .फिल्म दूसरे राज्यों में ज्यादा पैसा बटोर लेती है .प्रति -बंधित होने पर .हमने वर्जित क्षेत्र में प्रवेश की बाण जो पड़ चुकी है .शुक्रिया ब्लॉग पर आपकी सार्थक दखल और रचनात्मक हस्तक्षेप के लिए .
    कृपया यहाँ भी आपकी मौजूदगी अपेक्षित है -http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/2011/08/blog-post_9034.हटमल
    Friday, August 12, 2011
    रजोनिवृत्ती में बे -असर सिद्ध हुई है सोया प्रोटीन .

  5. मध्यवर्गी समाज और गरीबों के पैसे का भक्षण बिकुल सही कहा आपने भूषण जी
    राम जाने क्या होगा आरक्षण का
    खैर जो होगा ….शाम को मालूम हो जायेगा

  6. Apanatva says:

    🙂

    chuee muee par aapke hastakshar rah gaye hone…..

  7. विवाद का प्रतीक …. व्यवसाय. सुन्दर पोस्ट.

  8. रेखा says:

    आपने बिलकुल सही बात कही है . पता नहीं ऐसे लोग समाज को क्या सन्देश देना चाहते हैं ….

  9. Bhushan says:

    @ Apanatva
    लगता यही है :))

  10. भूषण जी हार्दिक अभिवादन निम्न कथन आप का सटीक न जाने क्या क्या तरीका लगाये जाते है बूम बूम के लिए …धमाका हो जाये और चल निकले
    भ्रमर ५
    इस फिल्म के जानकार लोगों की चर्चा से स्पष्ट हो गया कि फिल्म का थीम भारत सरकार की आरक्षण नीति न हो कर शिक्षा का व्यवसायीकरण है और कि प्रकाश झा ने विवाद और पैसा बटोरने के लिए फिल्म का नाम ‘Aarakshan’ (आरक्षण) रखा है.

  11. Apanatva says:

    sabkee apanee apanee ray ho saktee hai film humne dekhee aur pasand bhee bahut aaee…….
    aarakshan sahee naam diya……aur ise policy ka side effect to hona hee tha……

  12. Bhushan says:

    @ Apanatva
    आदरणीय सरिता जी, आपका यह कहना सही है कि 'इसे पॉलिसी का साइड इफैक्ट तो होना ही है.'

  13. विवाद का प्रतीक …. व्यवसाय फिल्म जगत तो मिसाल ही है.. सुन्दर पोस्ट.

  14. समाधान केवल इस्लाम है।
    प्रकाश झा व अन्य फ़िल्मकार जो सार्थक सिनेमा के अग्रदूत माने जाते थे वे भी अब दौलत की देवी के सामने घुटने टेक चुके हैं। विवाद पैदा करके फ़िल्म को चर्चित बनाना इनका पुराना स्टंट है। ये लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। ये लोग अपने सहयोग के लिए मीडिया को बाक़ायदा पेमेंट करते हैं ताकि दर्शकों की जेब से माल निकलवाया जा सके।
    इसका हल केवल इस्लाम है। इस्लामी उसूल के मुताबिक़ फ़िल्में बनें तो उनमें अश्लीलता आदि नहीं होगी और उनमें समाज के लिए सार्थक संदेश ज़रूर होगा लेकिन इस्लाम का नाम आते ही लोग बिदक जाते हैं और अपनी अपनी अक्ल का आश्रय लेते हैं। इस्लाम से हटने के बाद फ़िल्मों पर वैसा प्रतिबंध कभी लगने वाला नहीं है जैसा कि लोग उन पर लगते हुए देखना चाहते हैं।
    यह शक्ति केवल इस्लाम में है। इस संबंध में इस्लामी नियम स्पष्ट हैं। आज ज़रूरत है कि इस्लाम के नैतिक नियमों को अपनाकर उसकी नैतिक शक्ति से काम लिया जाए।
    समाधान केवल यही है।

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