Aboriginal Tribes await freedom आज़ादी की बाट जोहते आदिवासी (मूलनिवासी)

Since morning I have sent good wishes to many friends.  But a thought haunts me whether all people In India got the freedom.
Scheduled tribes of India are aboriginals of this land. They were chased away from their places by other tribes from Central Asia who grabbed their lush green land, riches and comfortable positions and settled in Indian areas while aboriginals went bust and settled in difficult areas and climates.These difficult areas include inaccessible mountainous terrain, forests, the island in rivers, plateau terrain, desert, etc. Of course, no winds of social development reached in these areas. However, in the name of industrialization too, they live with their ancient poverty and exploitation. Government and administration at times shows them the provisions and evict them from their homes and habitat whereas contractors, who have intruded into these areas with projects, have with them administration, police, media and everything. With these people there is their poverty and helplessness.
There is no leader of their own who can unite them. In the name of leadership they got naxalism which was never led by members of these tribes. Naxalite leaders are from high castes that live in cities and sit in the parliament.Whenever their local leaders or these people raise local issues (in fact national issue) they are lines up in front of guns of security forces.
Members of these tribes have been victims of atrocities of government officials and the police. In this process they went on withdrawing and were further divided in different names. As a result they never become a vote bank.
Their condition is similar to that of SCs and OBCs but STs are the worst hit.They are victims of hunger and malnutrition. Most of the money provided through government projects is drained by corruption.
Intellectuals reach at a consensus that deliberations should be held on these issues. They still stick to their opinion and it is perhaps sufficient. These natives of India will have to make their path to progress through education and mutual solidarity i.e. vote bank. It is not good to expect from others.

आज सुबह से कई मित्रों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई दे चुका हूँ. परंतु मन से एक विचार नहीं जाता था कि क्या भारत में सभी को आज़ादी मिल चुकी है?
भारत के आदिवासी इस भू-भाग के मूलनिवासी हैं. मध्य एशिया से आए अन्य कबीलों ने इन्हें खदेड़ा और इनके हरे-भरे, उपजाऊ और आरामदायक इलाकों में बस गए जबकि उजाड़े गए ये मूलनिवासी कठिन परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में चले गए. इन क्षेत्रों में दुर्गम पहाड़ी इलाके, घने जंगल, नदियों के बीच की ज़मीन, बाढ़ वाले इलाके,पठारी इलाके, रेगिस्तानी क्षेत्र आदि शामिल हैं. ज़ाहिर है इन क्षेत्रों तक सामाजिक विकास की बयार नहीं गई. अलबत्ता औद्योगीकरण के रूप में इन क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों और इन लोगों की सनातन निर्धनता के शोषण की विषैली हवा चली. शासन तो जब चाहे नियम दिखा कर इन्हें घरों से बेदखल कर देता है जबकि परियोजनाएँ लेकर इनके क्षेत्रों में घुस आए ठेकेदार के साथ शासन, पुलिस, मीडिया आदि सब कुछ है और उसे प्राप्त है छूट सब कुछ लूटने की. इन जनजातियों के साथ भ्रष्टाचारी व्यवस्था से उपजी गरीबी और मजबूरी है.

इन्हें संगठित करने वाला इनका अपना कोई नेता भी दिखाई नहीं देता. नेतृत्व के नाम पर इन्हें नक्सलवाद ज़रूर मिला लेकिन उसका नेतृत्व इन मूलनिवासियों के पास नहीं है. इनके शीर्षस्थ नेता ऊँची जाति के हैं जो संसद में, शहरों में विराजमान रहते हैं. जब-जब ये मूलनिवासी अपने मुद्दों पर संगठित होने लगते हैं व्यवस्था इनके शीर्ष नक्सलवादी नेतृत्व को बौद्धिक समर्थक कह कर आँखें मूँदे रहती है लेकिन इनके स्थानीय नेताओं और साधारण आदिवासियों को सुरक्षा बलों की बंदूकों के सामने पंक्तिबद्ध करना नहीं भूलती.
आम आदिवासी सरकारी अधिकारियों और पुलिसिया अत्याचारों का जितना शिकार हुआ है उतना और कोई नहीं. मार खाते-खाते ये सिमटते गए हैं और साथ ही नामों के आधार पर बँटते गए हैं. यही कारण है कि इनका संगठित वोट बैंक नहीं है.
इनसे मिलता जुलता हाल अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़ी जातियों का भी है. लेकिन आदिवासियों की स्थिति सब से खराब है. ये कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, समाजिक और शारीरिक अत्याचार, अशिक्षा, भुखमरी और कुपोषण का शिकार हैं और सरकारी विकास/राहत परियोजनाओं का अधिकतर पैसा भ्रष्टाचार द्वारा बीच में ही सोख लिया जाता है.

सारा बुद्धिजीवी वर्ग इस बात पर सहमत होता रहा है कि इनकी समस्याओं पर विचार मंथन होना चाहिए. इतना समय बीत जाने पर भी विचार मंथन पर सहमति कायम है, यह बड़ी बात है.
आगे का रास्ता मूलनिवासियों को शिक्षा, संगठन, राजनीतिक एकता और अपने वोट बैंक के ज़रिए स्वयं बनाना होगा. किसी से आशा करना ठीक नहीं.

जंगल चीता बन लौटेगा :  उज्जवला ज्योति तिग्गा

जंगल आखिर कब तक खामोश रहेगा
कब तक अपनी पीड़ा की आग में
झुलसते हुए भी
अपने बेबस आंसुओं से
हरियाली का स्वप्न सींचेगा
और अपने अंतस में बसे हुए
नन्हे से स्वर्ग में मगन रहेगा
….

पर जंगल के आंसू इस बार
व्यर्थ न बहेंगे
जंगल का दर्द अब
आग का दरिया बन फ़ूटेगा
और चैन की नींद सोने वालों पर
कहर बन टूटेगा
उसके आंसुओं की बाढ़
खदकती लावा बन जाएगी
और जहां लहराती थी हरियाली
वहां बयांवान बंजर नजर आएंगे
….

जंगल जो कि
एक खूबसूरत ख्वाब था हरियाली का
एक दिन किसी डरावने दु:स्वपन सा
रूप धरे लौटेगा
बरसों मिमियाता घिघियाता रहा है जंगल
एक दिन चीता बन लौटेगा
….

और बरसों के विलाप के बाद
गूंजेगी जंगल में फ़िर से
कोई नई मधुर मीठी तान
जो खींच लाएगी फ़िर से
जंगल के बाशिंदो को उस स्वर्ग से पनाहगाह में
……..
……..

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Born on January, 13, 1951. I love my community and country.
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22 Responses to Aboriginal Tribes await freedom आज़ादी की बाट जोहते आदिवासी (मूलनिवासी)

  1. बहुत अच्छा आलेख……

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

  2. कुछ आगे बढ़ें। लेकिन इन लोगों को समझाना भी आसान नहीं होता, समस्या यही है।

  3. वैसे आपने फिर आर्य वाला विवाद उठाने की ओर एक कदम उठा लिया है।

  4. रेखा says:

    सुन्दर आलेख अपने पैरो पर तो खुद ही खड़ा होना होगा. स्वतंत्र दिवस की शुभकामनाये .

  5. Bhushan says:

    @ Dr Varsha Singh
    @ रेखा
    आप दोनों का आभार.
    @ चंदन कुमार मिश्र
    इन लोगों के बारे में जब भी कुछ लिखा जाता है तभी 'आर्य' शब्द उसकी पृष्ठभूमि में दिखने लगता है. आपको भी दिखा है यद्यपि मैंने उसका कहीं प्रयोग नहीं किया है. मिश्र जी मैं क्या करूँ.

  6. शब्द न लिखने पर भी शुरु में ही यह कहना कि मूल निवासियों को भगा कर अपने समतल और अच्छी जमीन पर कोई रहने लगा, संकेत तो कर ही रहा है। लेकिन कोई बात नहीं है। मैं फिर कहता हूँ यह हजारों साल पहले हुआ भी तो कोई मतलब नहीं रखा जाय इससे। वैसे भी दस हजार साल पहले घटी बात को लेकर अब हम किसे दोषी ठहराएँ? लेकिन आज तो यह दिख रहा है कि कैसे लोग उनसे घृणा करते हैं या उन्हें नीच मानते हैं, यह भी एक जहर है। इसके लिए हमें कुछ करना चाहिए। आप इसका बुरा न मानें क्योंकि यह बात ध्यान से पढ़ते ही आर्यों का खयाल आना ही है। लेकिन अब हम इसको लेकर परेशान न हों।

  7. Bhushan says:

    @ चंदन कुमार मिश्र
    बात मेरी व्यकितगत परेशानी की नहीं है. देश के मानव संसाधनों को लेकर जितना मैं कभी परेशान होता हूँ उससे कहीं अधिक परेशानी मैंने आपके आलेखों में देखी है. जहाँ तक आदिवासी शब्द का प्रश्न है यह बहुत देर से प्रयोग हो रहा है. इसी का समानार्थी शब्द मूलनिवासी हाल ही में देखने में आया है. हाल ही में आदिवासियों के लिए वनवासी शब्द भी देखने में आया है जो उनके मूलनिवासी होने चुनौती देता प्रतीत होता है. कई लोगों की ऐसी चिंता है. खैर अधिक ज़रूरी है इन लोगों का विकास जिसके अभाव में पूरा देश गरीब और कुप्रबंधन का शिकार ही कहलाएगा.

  8. बहुत सार्थक प्रस्तुति..मैंने अपने कार्यकाल के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासियों की हालत देखी है. इतनी दयनीय हालत में होने पर भी लोग उनका शोषण करने से नहीं चूकते. आज़ादी का क्या मतलब है उनके लिए ?

  9. Bhushan says:

    @ Kailash C Sharma
    आपकी तत्विषयक चिंता महत्वपूर्ण है. आभार.

  10. Jyoti Mishra says:

    Those people are living in worst dilemma legally they are independent but when u look deep than u realize that their freedom is superficial and for them is just any other word in dictionary.

    Well said n timely post

  11. सदा says:

    सार्थक एवं सटीक लेखन के लिये आभार ।

  12. veerubhai says:

    आदिवासियों से ताल्लुक रखने वाला एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ इतिहास के झरोखे से आपने उकेरा है भूषन जी ,कसावदार बढ़िया समीक्षा .बधाई यौमे आज़ादी किसके लिए ?
    Tuesday, August 16, 2011
    उठो नौजवानों सोने के दिन गए ……
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
    सोमवार, १५ अगस्त २०११
    संविधान जिन्होनें पढ़ लिया है (दूसरी किश्त ).

    http://veerubhai1947.blogspot.com/

  13. veerubhai says:

    आदिवासियों से ताल्लुक रखने वाला एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ इतिहास के झरोखे से आपने उकेरा है भूषन जी ,कसावदार बढ़िया समीक्षा .बधाई .यौमे आज़ादी किसके लिए आखिर ?
    Tuesday, August 16, 2011
    उठो नौजवानों सोने के दिन गए ……
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
    सोमवार, १५ अगस्त २०११
    संविधान जिन्होनें पढ़ लिया है (दूसरी किश्त ).
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    मंगलवार, १६ अगस्त २०११
    त्रि -मूर्ती से तीन सवाल .

  14. veerubhai says:

    Good post .I share yr concern about Adivaseez.Thanks for yr kind visit and encouragements .

  15. Dorothy says:

    आपके दिए गए लिंक को देखा. काफ़ी अच्छा लगा. आपको बहुत बहुत बधाई. आभार..
    सादर,
    डोरोथी.

  16. बहुत अच्छा आलेख…….

  17. बहुत बढ़िया चिंतनशील प्रस्तुति के लिया बहुत बहुत आभार

  18. ZEAL says:

    8५ प्रतिशत जनता आजाद नहीं है । हम तो एक दुसरे को बधाई देकर खुश हो लेते हैं । लेकिन आजादी सम्पूर्ण नहीं है। ह्रदय को विचलित करने वाली स्थितियां हैं हमारे देश में।

  19. Anonymous says:

    Dear Sirs/Madams,

    I have not seen a single TV Media Channel in India highlighting the issue of Tribal Mulnivasis of India. It is irony that Tribal people have no mass leader who can exclusively fight for their rights. Media has potential to transform the views of millions of people world wide but I fail to understand the biased attitude of Print/Electronic Media in India.

    We must not forget that Anna's struggle for corrupt-free India is gaining heights only due to Media, which instigates youngsters/intellectuals to form a common consensus. If Media takes up the above issue of Tribal people, their will be guaranteed revolution in India on this issue.

    Navin K. Bhoiya
    (Your friend in Mission)

    (Hello Bhushan Sir: You are always raising burning issues, which inspires all of us. Thanks).

  20. आदिवासियों की स्थिति का बिल्कुल सही विश्लेशण किया है आपने।
    सरकार को आदिवासियों की याद केवल गणतंत्र दिवस के कुछ पहले आती है, ताकि वे परेड में सज-संवर कर दर्शकों का मनोरंजन कर सकें। उनके विकास के लिए जो धन सरकार द्वारा दिया जाता है उसका ज्यादातर हिस्सा अधिकारी और नेता डकार जाते हैं।

  21. boletobindas says:

    आज अन्ना के आंदोलन में ये कहीं खो से गए हैं…. पर बिसारे नहीं गए हैं…इनकी आवाज़ को किसी अन्ना की जरुरत नहीं रह गई है…ये आवाज बहरी सरकार के कान में गूंज रहे हैं…अन्ना की आंधी के ठीक पीछे इनका ही खासोश तूफान अपने नंबर का इंतजार कर रहा है..इस तूफान को रोकना बेहद जरुरी है…

  22. prerna argal says:

    आपकी पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (६) के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ /आप हिंदी के सेवा इसी तरह करते रहें ,यही कामना हैं /आज सोमबार को आपब्लोगर्स मीट वीकली
    के मंच पर आप सादर आमंत्रित हैं /आभार /

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