Hello blogger! Feeling lonely? – ब्लॉगर जी ! एकाकी हो क्या?

हो सकता है कि एकाकी होने के कारण आप देश, दुनिया और समाज के लिए बहुत उपयोगी हों. 
दूर की कौड़ी लाया हूँ परंतु बहुत दूर की नहीं है. साथियों की बात नहीं करता, अपनी बात करता हूँ. जैसे ही सुबह होती है अगली पोस्ट लिए सोच दौड़ने लगती है. मन कहीं-न-कहीं से मसाला ढूँढ लाता है और आख़िर ब्लॉगिंग जैसी ज़रूरी चीज़ के लिए तड़प शांत होती है. इस बीच मेरा एकाकीपन फलता-फूलता है. पत्नी कहे कि बाज़ार जाना है, तो नहीं जाना है. वह कहे कि खाना खा लो, तो नहीं ही खाना है क्योंकि ब्लॉगिंग चल रही है.
ब्लॉगर की हैसियत में सामाजिक मेल-मिलाप से बचने वाला जीव हूँ. इसी सिलसिले में समझता हूँ कि सभी ब्लॉगर अपने ब्लॉग की आवश्यकताओं के लिए एकाकी हो जाते होंगे जब वे कंप्यूटर पर बैठते ही विचारों में मग्न हो जाते होंगे. 
इज़राइल के एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक डॉ. साची ईन-डॉर ने निष्कर्ष निकाला है कि जो जितना एकाकी होता है वह खतरे को उतना ही जल्दी सूँघ लेता है और वह इस हालत में आ जाता है कि आवश्यकता पड़ने पर दूसरों के लिए जान भी देने के लिए तैयार हो जाता है.  
उनका शोध पढ़ने के बाद विचार आया कि मुंबई प्रवास के दौरान वहाँ की ट्रैफिक के धुएँ और गंदगी के कारण मेरी घ्राणशक्ति मर गई थी. तथापि मैंने पाया है कि मेरी लंबी नाक कुछ खतरों तक पहले पहुँच जाती है. जैसे ठंडी हवाएँ चलने से पहले ही नहाना कम कर देता हूँ क्योंकि ज़ुकाम होने का अंदेशा पहले से हो जाता है. :))
डॉ. साची का शोध गंभीर मामला भले न हो लेकिन इस अर्थ में गंभीर विषय ज़रूर है कि मेल-मिलाप से बचने की चाह रखने वाले लोगों में चिंता की प्रवृत्ति कुछ ज़्यादा होती है अतः वे गंभीर परिस्थितियों को जल्दी ताड़ लेते हैं.
क्या बार-बार एकाकीपन में जाने वाले ब्लॉगर्स में ऐसा सहजज्ञान उत्पन्न हो जाता है कि वे भविष्य के ख़तरों (गंभीर परिस्थितियों) को समय से पूर्व जान लें और अपने आलेखों में उतार दें. अधिकतर ब्लॉगर्स अपने इस गुण से प्रत्यक्षतः वाकिफ़ नहीं हैं.
कुछ माह पूर्व मेरे बंद हो चुके निरत ब्लॉग को सीआईए ने विज़िट किया था. चौकन्नी एजेंसी है. संभव है हमारे हिंदी बलॉग्स से वह कई प्रकार की जानकारी एकत्रित करती हो. हमारे चिट्ठे व्यक्तिगत और सामाजाजिक सोच के लक्षणों को रूपायित करते हैं. हम अवश्य ऐसी बातें अपने-अपने ब्लॉग्स में लिखते हैं जो उनके लिए शोध का विषय हैं. वरना ब्लॉग्स के लिए गूगल मुफ़्त जगह क्यों देगा? हिंदी से अंग्रेज़ी अनुवाद की व्यवस्था पर इतना खर्च क्यों करेगा?
अमेरिका अपनी नीतियाँ बनाने में दूरदर्शी है. मैं इससे बहुत चिंतित रहता हूँ. साथ ही यह सोच कर खुश होता हूँ कि भविष्य की नीतियाँ तय करने के लिए शायद भारत सरकार कभी हिंदी ब्लॉगिंग को गंभीरता से ले. लेकिन यदि रॉ (RAW) मेरे मेघनेट पर rawfoods.com बन करशोध करने पहुँचे, तो इसे मैं स्वादपूर्वक तो नहीं खा सकता न!! कभी-न-कभी एकाकीपन में सरकार के खिलाफ भड़ास निकल जाती है. सरकार कितनी अच्छी है मेरी छोटी-मोटी ग़ुस्ताख़ियों को माफ़ कर देती है.
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17 Responses to Hello blogger! Feeling lonely? – ब्लॉगर जी ! एकाकी हो क्या?

  1. दूर की कौड़ी नहीं है यह.
    सबको सचेत रहना चाहिए.
    अमेरिका वगैरह बीस साल बाद की स्थिति का अनुमान करके नीतियां बनाते हैं, और यही नहीं, वे दुसरे देशों की नीतियों को भी गुपचुप बदलवाने की चेष्टा करते हैं.

  2. सही है लगे रहिये ब्लागिंग में। कल को क्या पता खुफ़िया एजेंसियों की जगह ब्लागरों को ही लगाया जाये कि वे खतरे की पूर्वसूचना दिया करें। 🙂

  3. बढ़िया पोस्ट … मुझे तो लगता है प्रेयसी की जगह कंप्यूटर ने ले ली है … अब तो इसीसे इश्क है, इसीसे मुहब्बत …

  4. ZEAL says:

    मुझे तो solitude ही पसंद है। खतरे की घंटी भी अक्सर समय से पूर्व ही बजने लगती है। खतरनाक जीव-जंतुओं से दूरी बनाये रखती हूँ। जब कम्पूटर है और ब्लौगिंग है तो क्या गम है ? खुद को भी खुश रखा जा सकता है और भूले भटके किसी के काम भी आया जा सकता है । यही है सार जीवन का – सुख , प्रेम, संतुष्टि एवं compassion।

  5. Bhushan says:

    @ निशांत मिश्र
    @ अनूप शुक्ल
    @ Indranil Bhattacharjee
    @ ZEAL
    हम्म्… आप सभी ने एक प्रकार से डॉ. साची की खोज पर मुहर लगा दी है विशेष कर डॉ. दिव्या ने अपनी स्वीकारोक्ति से. आभार.

  6. http://hbfint.blogspot.com/2011/09/blog-post_06.html

    एक तरफ़ तो बीजेपी के बड़े मुस्लिम पीरों की दरगाहों पर क़ीमती चादरें चढ़ाते हुए और मुस्लिम टोपी पहनकर रमज़ान में अफ़्तार करते और कराते हुए देखे जा सकते हैं और दूसरी तरफ़ उनका हाल यह है कि उन्हें अल्लाह का नाम लेने पर भी ऐतराज़ है।

    क्या भारतीय संस्कृति में ईश्वर का नाम लेने पर प्रतिबंध है ?

    —————

    भाई साहब अभी अभी मैंने एक लेख लिखा है और लिखने के बाद आपका चिंतन पढ़ लिया।
    कृप्या बताएं कि यह लेख पढ़ने के बाद कोई मेरा कुछ बिगाड़ने की धमकी तो नहीं देगा न ?
    हालांकि भारतीय संस्कृति कहती है कि तुम कुछ कर नहीं सकते जब तक कि वह प्रारब्ध के अनुसार पूर्वनियोजित न हो लेकिन भाई बीजेपी और सरकारी संस्थाएं तो प्रारब्ध का ही अतिक्रमण कर देती हैं,
    क्या वास्तव में कोई प्रारब्ध होता भी है ?
    यह प्राचीन काल में सामाजिक क्रांतियों के दमन-शमन के लिए इस तरह की मनघड़ंत बातें फैला दी गईं ?
    क्या है सच्चाई ?
    कोई तो बताओ भाई ?
    आ जाओ बहस कर लो
    कि ब्लॉगर सारे घर वालों से अलग थलग इसीलिए तो पड़ जाता है कि तुम्हारा ख़ून जलाए और अपना ख़ून सुखाए।
    आओ न यार ,
    बहुत दिन हो गए बोर होते हुए।

    अच्छे और सच्चे चिंतन के लिए साधुओं वाला वाद , निर्विवाद !!!

  7. बहुत दिनों बाद एक बहतरीन लेख़ पढने को मिला.

  8. वाकायइ, कई एजेंसिया हमारे ब्लोगों को खंगालती होंगी….

    बेहतरीन लेख.

  9. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद

  10. रेखा says:

    बेहतरीन आलेख …….

  11. मजेदार पोस्ट…

    नीरज

  12. Sunil Kumar says:

    बेहतरीन लेख.शुभकामनायें

  13. बहुत खूबसूरत और सार्थक आलेख। ब्लॉगिंग एकाकी तो नहीं बनाता लेकिन एकाकीपन को समाप्त करने का बहुत प्रभावी उपाय है। आभार

  14. Pallavi says:

    बहुत बढ़िया पोस्ट सर, कैलाश अंकल कि बात से पूर्णरूप से सहमत। ब्लॉगिंग एकाकी तो नहीं बनाता लेकिन एकाकीपन को समाप्त करने का बहुत प्रभावी उपाय है। आभार

  15. This comment has been removed by the author.

  16. अब लीजिए यह। यह शोध तो मुझे बहुत हद तक सच लग रहा है।

  17. मुझे भी लगता है, एकाकी होना is अ boon in disguise ..

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