Beyond the principles of profession – धंधे के उसूलों से परे

15-20 दिन पहले मैंने एक निर्मल बाबा को अपने सोशल नेटवर्क अकाऊँट से बाहर किया था. पता नहीं वह कौन था. लेकिन आजकल एक निर्मल बाबा चर्चा में हैं. अस्तु.

बाबा लोगों का कारोबार मूलतः ‘चर्चा’ से चलता है. लोग जुटते हैं. टीवी चैनल बाबाओं की ‘दिव्य’ छवियाँ जन-जन के मन-मन पर बनाते हैं और उन्हें ‘संस्कार’ रूप में प्रदीप्त रखते हैं. ये छवियाँ न केवल लोगों के मन में बैठ जाती हैं बल्कि समय-समय पर उठ कर दैवी रूप धारण कर प्रकट भी होने लगती हैं, ‘आस्था’-‘श्रद्धा’ के तत्त्व के सौजन्य से.

इस क्षेत्र के और भी बड़े-बड़े कारोबारी हैं. ये मठाधीश, अखाड़ाधीश, धर्माधीश आदि ‘ईश’ कहलाते हैं. कइयों की उपाधियों में बापू, आचार्य, संत, परम संत, सद्गुरु, जगद्गुरु आदि लगता है. ये इस क्षेत्र के नवागंतुकों को जमने नहीं देते यदि वे समुचित और नियमित ‘भेंट’ और ‘चढ़ावा’ इन तक न पहुँचाएँ और सिर न नवाएँ. आखिर सीनियारिटी-सह-मैरिट जैसी लंबी सफ़ेद दाढ़ी भी कोई चीज़ है.
धर्म के कारोबार से हुई ‘साफ़-सुथरी’ कमाई का राजनीति से ‘लेना-देना’ होता है. इसे जीजा जी से बेहतर कौन जाने लेकिन साला साहब को मिली काउंसलिंग में कहीं न कहीं भारी कमी रह गई. ठेकेदारी फेल हो गई. अन्यथा ठेकेदार जानते हैं कि रेट और बिल में किस का कितना हिस्सा शामिल होता है.
खेतों में रास्ता ढूँढ रहे बाबाओं को नेक सलाह है जी, कि भले ही आप आयकर देने के मामले में ईमानदार हों लेकिन जाएँ उसी रास्ते से जिस पर ‘धर्म’ का हाइवे टोल प्लाज़ा हो और हर कच्चे-पक्के रास्ते पर ‘राजनीति’ की चुंगी हो. उनसे चोरी-चोरी, चुपके-चुपके‘ की ठगी नहीं चल सकती. नो शॉर्टकट प्लीज़. इट इज़ सीरियस (.|.) 

बाबा लोगो, कुछ समझा करो यार.

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Born on January, 13, 1951. I love my community and country.
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4 Responses to Beyond the principles of profession – धंधे के उसूलों से परे

  1. सही कह रहे हैं सर!

    सादर

  2. sushila ✆ to me

    भारतीय जनमानस की नब्ज पकड़ ली है इन बाबाओं ने। अब बैठे-बिठाये लाखों के वारे-न्यारे हों तो कोई धूप में क्यों जले?

  3. बाबाओ के क्या कहने

  4. हर व्यक्ति शोर्ट कट की तलाश में है और बाबाओं को उसकी परख है.

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