Hello dear omniscient – हैलो जी अंतर्यामी जी !!

जी, यह पोस्ट आप ही को संबोधित है. ज़रा लंबी पोस्ट है लेकिन इसे पढ़ना आपको अच्छा लगेगा क्योंकि इसमें जो भी है वह दिव्य है.
अपने कई संबंधियों, मित्रों और ब्लॉगरों से उनके दिव्य सपनों, दिव्य दृष्टि, दैवी दृष्यों, टेलिपैथी और क्लेयरवायंस के अनुभवों की जानकारी मिली है.
बचपन में एक कहानी सुनी थी कि एक पैदायशी चोर के सपने में भगवान जी ने आकर धरती में गड़े ख़ज़ाने का पता दिया, वह उसे प्राप्त करके धनाड्य हो गया और आगे चल कर उसका विवाह एक राजकुमारी से हुआ. रुचिकर.

सपने हों या दिव्य दृश्य या उनमें दिखे शब्द हों, अंक हों या उनके अर्थ या कोई रूप-रंग-रेखा, ये हमारे मन पर पड़े संस्कारों का मिश्रण है. मन की कार्यप्रणाली क्लिष्ट है. इस पर पड़े संस्कार तंत्रिका (न्यूरल) गतिविधि के कारण तरह-तरह के रूप धारण करके आते हैं- नींद में या जागृत अवस्था में. योग की अवस्थाओं के चित्रण में माथे पर बना त्रिनेत्र या तीसरा तिल या त्रिकुटी और उसमें से निकलती किरणें इसी को इंगित करती हैं. इसमें भावी के दृष्य भी दिख जाते हैं जो कभी सत्य साबित होते हैं और कभी सत्य नहीं भी होते, लेकिन लोग देखते हैं. बहुधा हम मन पर उभरे किसी बिंब को ऐसे बिंब में बदल लेते हैं जिस रूप में उसे देखने की हमारी इच्छा है. प्रेमियों और भक्तों का सौदाईपना इसका सुंदर उदाहरण है. अलबत्ता इन अनुभवों में एक बात सामान्य है कि हम देखते वही हैं जो हम देखना चाहते हैं. इसे चंदियन प्रभाव (Chandian effect) भी कहा गया है.
फ्रायड जैसे धुरंदर मनोविश्लेषक हुए हैं जिन्होंने आधुनिक मनोविज्ञान को बहुत प्रभावित किया है. लेकिन वे भी मन-धारियों की निजी पुष्टि (proving) के बिना निष्कर्ष नहीं दे सकते थे. दूसरे शब्दों में मेरे मन को मुझ से बेहतर दूसरा नहीं जान सकता. यही बात आप, आप और आप पर लागू होती है. एक व्यक्ति का यह जानना कि उसके अपने अंतर में क्या है, इसे ही अंतर्यामी होना कहा गया है. यानि जो अपने भीतर दाखिल हो कर देख ले कि उसके अपने मन में या शरीर में क्या है. जहाँ किसी अन्य (साधु-महात्मा) का अंतर्यामी होना पाया गया है वहाँ अधिकतर धोखा, फ़रेब और लूट दिखी है.
व्यक्ति से बेहतर कोई नहीं जान सकता कि उसे अपने भीतर जो दिखता है वह क्यों दिखता है और उसका गूढ़ अर्थ क्या है. उसके लिए यह बात महत्व रखती है कि दैवी दृष्य के प्रति उसका दृष्टिकोण या उसकी नीयत क्या है. इसके पीछे उसकी प्रबल और दबी इच्छा, उसके भय, उसकी तीव्र घृणा आदि हो सकते हैं.
आपके मन में क्या है मैं कैसे कह सकता हूँ. ऐसे ही मेरे मन में क्या है यह मैं बता सकता हूँ. सच यह है कि हम स्वयं ही स्वयं के अंतर्यामी हैं और इसमें कोई अहंकार भी निहित नहीं है.
रही चोर की कहानी तो इसमें कथाकार बड़ी सौम्य विद्वत्ता से चोरी से सत्ता तक की सुरक्षित यात्रा ब्यान कर गया है. यहाँ विचार आता है कि चोरों को ख़ज़ाना मिल सकता है तो हमें क्यों नहीं. इतना जानना काफी है कि चोर के पास ख़ज़ाने का पता मात्र था, शेष उसका परिश्रम है.
ज्ञानियों का मानना है कि हमें वही ख़ज़ाना दिखता और मिलता है जिसे हम सच्चे दिल से चाहते हैं या अनजाने में जिसकी प्रबल इच्छा कर चुके होते हैं. अंततः हमारी दृढ़ प्रतिबद्धता और श्रम है जो रेखांकित होते हैं.
कुछ आप भी कहिए न अंतर्यामी.

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20 Responses to Hello dear omniscient – हैलो जी अंतर्यामी जी !!

  1. कल 16/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  2. Vijai Mathur says:

    आपका निष्कर्ष बिलकुल सही है कि,अंतर्यामी का अर्थ अपने तन और मन मे झांकना है। दरअसल ” अध्यात्म=अपनी आत्मा का अध्यन ” सूत्र पर आधारित यही निष्कर्ष युक्तिसंगत है बाकी तो भटकाव के सिवा कुछ नहीं है।

  3. यशवंत जी आपको धन्यवाद.

  4. आपका आभार माथुर साहब. आपने जो अर्थ बताया है उससे हट कर कुछ भी नहीं. हमें अनपढ़ता और अज्ञान की धारा में बहा दिया गया है. बस इतनी सी बात है. हम गृहस्थी लोग अपनी अज्ञानता के कारण लूटे जा रहे हैं.

  5. @ ज्ञानियों का मानना है कि हमें वही खजाना दिखता और मिलता है जिसे हम सच्चे दिल से चाहते हैं या अनजाने में जिसकी प्रबल इच्छा कर चुके होते हैं. अंततः हमारी दृढ़ प्रतिबद्धता और श्रम है जो रेखांकित होते हैं.

    छोटे से दृष्टांत के सहारे आपने एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक तथ्य को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है।

  6. हम स्वयं ही स्वयं के अंतर्यामी हैं, पूर्ण सहमती. पोस्ट भी पूरी ज्ञानवर्धक है.

  7. दृढ़ प्रतिबद्धता और श्रम ही रेखांकित होते हैं.सुंदर मनोवैज्ञानिक लेख.

  8. दृढ़ प्रतिबद्धता और श्रम ही रेखांकित होते हैं.सुंदर मनोवैज्ञानिक लेख.

  9. पंछी says:

    bilkul sahi..jisne khud ko jaan lia…khud ko pahchan lia..vahi hai antaryami 🙂

  10. फिर भी लोग भटकते हैं अंतर्यामी की खोज में … बहुत साधा हुआ लेख

  11. hum khud hi bata sakte hain ki humare andar kya hai jo hum dekhna chahte hain vahi hume dikhta hai ..bahut achcha samadhan kiya hai jigyasa ka bahut achchi manovaigyaanik post.aabhar.

  12. व्यक्ति से बेहतर कोई नहीं जान सकता कि उसे अपने भीतर जो दिखता है वह क्यों दिखता है और उसका गूढ़ अर्थ क्या है. …बिलकुल सही कहा है,आपने.

  13. आपकी सभी प्रस्तुतियां संग्रहणीय हैं। .बेहतरीन पोस्ट .
    मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए के लिए
    अपना कीमती समय निकाल कर मेरी नई पोस्ट मेरा नसीब जरुर आये
    दिनेश पारीक
    http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

  14. जो कुछ है मन के अंदर ही है और इसे देखना प्राप्त करना भी कठिन परिश्रम ही है … सार्थक पोस्ट है …

  15. Pallavi ✆ to me

    बहुत ही सार्थक पोस्ट काश यह बात सब समझ पाते कि अपने मन के अंदर देखना ही अंतर्यामी होना है तो शायद इस दुनिया में थोड़ा अंधविश्वास कम होता।

  16. सदा says:

    आपकी बात से बिल्‍कुल सहमत हूं … अन्‍तर्मन को जगाती उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति ।

  17. सत्य कहा है आपने स्वयं का ज्ञान ही आत्मज्ञान है परन्तु यह इतना सरल भी नहीं कहीं कहीं हम अपने ही मन की जटिलताओं में खो जाते हैं…..कई बार व्यक्ति के साथ वो सब भी बीतता है जो उसने कभी नहीं सोचा होता ।

  18. अच्छा लगा पढना

  19. ZEAL says:

    Very analytical post. Loving it !

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